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स्मत्पु॑रंधिर्न॒ आ ग॑हि वि॒श्वतो॑धीर्न ऊ॒तये॑ । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

smatpuraṁdhir na ā gahi viśvatodhīr na ūtaye | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||

पद पाठ

स्मत्ऽपु॑रन्धिः । नः॒ । आ । ग॒हि॒ । वि॒श्वतः॑ऽधीः । नः॒ । ऊ॒तये॑ । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.६

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:12» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:6


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्मत् पुरन्धिः-विश्वतोधी:

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (स्मत् पुरन्धिः) = प्रशस्त पालक बुद्धिवाले आप (नः आगहि) = हमें प्राप्त होइये। (विश्वतः धीः) = सब ओर चलनेवाली बुद्धिवाले आप (नः) = हमारे ऊतये रक्षण के लिये होइये। आप से प्रशस्त पालक बुद्धि को प्राप्त करके तथा सब विषयों में प्रवेशवाली बुद्धि को प्राप्त करके हम अपना रक्षण कर सकें। [२] हे ज्ञानधन जीव ! तू शासक प्रकाशमय प्रभु के ज्ञानधन को प्राप्त कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें प्रशस्त पालक बुद्धि को दें। हम सब विषयों में प्रवेशवाली बुद्धि को प्राप्त करके अपना कल्याण सिद्ध कर सकें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, enlightened with the thought and wisdom of universal order, equipped with the power and competence of a ruler of cities, come and take over the reins of government for our protection and advancement, and from the light and wisdom of the sages of vision and command, O lover and giver of a rule of peace and enlightenment, rise to the light and heaven of your imagination.