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आ त्वा॒ ग्रावा॒ वद॑न्नि॒ह सो॒मी घोषे॑ण यच्छतु । दि॒वो अ॒मुष्य॒ शास॑तो॒ दिवं॑ य॒य दि॑वावसो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā tvā grāvā vadann iha somī ghoṣeṇa yacchatu | divo amuṣya śāsato divaṁ yaya divāvaso ||

पद पाठ

आ । त्वा॒ । ग्रावा॑ । वद॑न् । इ॒ह । सो॒मी । घोषे॑ण । य॒च्छ॒तु॒ । दि॒वः । अ॒मुष्य॑ । शास॑तः । दिव॑म् । य॒य । दि॒वा॒व॒सो॒ इति॑ दिवाऽवसो ॥ ८.३४.२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:34» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:11» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:2


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

आचार्य द्वारा ज्ञानदान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इह) = इस ब्रह्मचर्याश्रम में (ग्रावा) = उपदेष्टा गुह (सोमी) = स्वयं सोम का रक्षण करनेवाला होता हुआ (त्वा वदन्) = तुझे पुकारता हुआ [उपास्मान् वाचस्पतिह्वयताम् अथर्व ० १।१।४] (घोषेण) = इन वेद-मन्त्रों के उच्चारण के द्वारा (आयच्छतु) = सब विषयों में [समन्तात्] ज्ञान देनेवाला हो । आचार्य उच्चारण कर उसके बाद तू भी उसी प्रकार उच्चारण करता हुआ ज्ञान को प्राप्त कर । [२] हे (दिवानसो) = ज्ञानधन ! तू (अमुष्य) = उस (शासतः) = शासक प्रभु के (दिवम्) = ज्ञान को (यय) = प्राप्त कर ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-आचार्य हमें अपने समीप बुलाये और स्वयं वेद घोष करता हुआ हमारे लिये वेदज्ञान को दे।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The maker of soma, creator of the joy of a new life, would welcome you here with a loud proclamation and exalt you with the voice of thunder, and from the light and power of the sage’s revelation, O lover of light, go and rise to your own essential heaven of freedom.