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य उ॒ग्रः सन्ननि॑ष्टृतः स्थि॒रो रणा॑य॒ संस्कृ॑तः । यदि॑ स्तो॒तुर्म॒घवा॑ शृ॒णव॒द्धवं॒ नेन्द्रो॑ योष॒त्या ग॑मत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ya ugraḥ sann aniṣṭṛtaḥ sthiro raṇāya saṁskṛtaḥ | yadi stotur maghavā śṛṇavad dhavaṁ nendro yoṣaty ā gamat ||

पद पाठ

यः । उ॒ग्रः । सन् । अनिः॑ऽस्तृतः । स्थि॒रः । रणा॑य । संस्कृ॑तः । यदि॑ । स्तो॒तुः । म॒घऽवा॑ । शृ॒णव॑त् । हव॑म् । न । इन्द्रः॑ । यो॒ष॒ति॒ । आ । ग॒म॒त् ॥ ८.३३.९

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:8» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:9


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्थिरः, रणाय संस्कृतः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (उग्रः) = तेजस्वी (सन्) = होता हुआ (अनिष्टृतः) = शत्रुओं से निस्तीर्ण नहीं किया जा सकता, शत्रु जिसका पराभव नहीं कर सकते, (स्थिरः) = जो स्थिर है, अविचल है, (रणाय संस्कृतः) = युद्ध के लिये पूर्णरूप से सज्जित है, शस्त्र आदि से अलंकृत है। इस प्रकार ये (इन्द्रः) = शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभु हैं। वस्तुतः जो प्रभु-भक्त होते हैं वे 'तेजस्वी- शत्रुओं से अपराभूत-स्थिर व युद्ध के लिये सुसज्जित' होते हैं। ये शत्रुओं से कभी पराजित नहीं होते। [२] ये (मघवा) = ऐश्वर्यशाली 'इन्द्र' (यदि) = यदि (स्तोतुः हवं शृणवत्) = स्तोता की पुकार को सुनते हैं तो (न योषति) = उसे हिंसित नहीं होने देते। (आगमत्) = उसकी रक्षा के लिये आते ही हैं। प्रभु- भक्त प्रभु की आराधना से अपने में शक्ति का अनुभव करता है और अपना रक्षण करने में समर्थ होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु-भक्त 'तेजस्वी, शत्रुओं से अपराभूत, स्थिर व युद्ध के लिये सुसज्जित' बनता है। प्रभु को पुकारता हुआ अपने में शक्ति का संचार करता है।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra who is blazing strong, uncountered and irresistible, constant and unshakable, is ever in perfect harness for the human’s battle of existence, and if he hears the call of the celebrant, the lord of might and majesty never forsakes him, he comes, he saves, he blesses.