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यो धृ॑षि॒तो योऽवृ॑तो॒ यो अस्ति॒ श्मश्रु॑षु श्रि॒तः । विभू॑तद्युम्न॒श्च्यव॑नः पुरुष्टु॒तः क्रत्वा॒ गौरि॑व शाकि॒नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo dhṛṣito yo vṛto yo asti śmaśruṣu śritaḥ | vibhūtadyumnaś cyavanaḥ puruṣṭutaḥ kratvā gaur iva śākinaḥ ||

पद पाठ

यः । धृ॒षि॒तः । यः । अवृ॑तः । यः । अस्ति॑ । श्मश्रु॑षु । श्रि॒तः । विभू॑तऽद्युम्नः । च्यव॑नः । पु॒रु॒ऽस्तु॒तः । क्रत्वा॑ । गौःऽइ॑व । शा॒कि॒नः ॥ ८.३३.६

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:8» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:6


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

क्रत्वा गौरिव शाकिनः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो प्रभु (धृषितः) = शत्रुओं का धर्षण करनेवाले हैं। (यः अवृतः) = जो शत्रुओं से घिरे हुए नहीं है, घेरे नहीं जा सकते हैं । (यः) = जो (श्मश्रुषु) = [युद्धेषु, श्रयन्त्यस्मिन् वीराः] युद्धों में (श्रितः अस्ति) = आश्रय किये जाते हैं। युद्धों के समय सब प्रभु का ही स्मरण करते हैं। [२] वे (विभूतद्युम्नः) = देदीप्यमान ज्ञान ज्योतिवाले व प्रभूत धनवाले [द्युम्न - धन] प्रभु च्यवनः शत्रुओं को च्युत करनेवाले हैं। अतएव (पुरुष्टुतः) = खूब ही स्तुति किये जाते हैं। ये प्रभु (क्रत्वा) = प्रज्ञानपूर्वक कर्म के द्वारा [क्रतु- प्रज्ञान, कर्म] (शाकिनः) = अपने को शक्तिशाली बनानेवाले यज्ञशील पुरुष के लिये (गौः इव) = गौ के समान हैं। जैसे गौ दूध को देती है, इसी प्रकार प्रभु इस यजमान की सब कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शक्तिशाली अनन्त धनवाले प्रभु कर्मों द्वारा अपने को शक्तिशाली बनानेवाले यजमान की सब कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I celebrate the glory of Indra who is bold and resolute, unbounded irresistible, wears the marks of manly vigour, commands honour and excellence, is an inspirer, mover and shaker, universally respected for his acts of piety, and who for the men of mighty dynamism is generous as earth, gracious as holy speech and loving as mother cow.