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यः सु॑ष॒व्यः सु॒दक्षि॑ण इ॒नो यः सु॒क्रतु॑र्गृ॒णे । य आ॑क॒रः स॒हस्रा॒ यः श॒ताम॑घ॒ इन्द्रो॒ यः पू॒र्भिदा॑रि॒तः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaḥ suṣavyaḥ sudakṣiṇa ino yaḥ sukratur gṛṇe | ya ākaraḥ sahasrā yaḥ śatāmagha indro yaḥ pūrbhid āritaḥ ||

पद पाठ

यः । सु॒ऽस॒व्यः । सु॒ऽदक्षि॑णः । इ॒नः । यः । सु॒ऽक्रतुः॑ । गृ॒णे । यः । आ॒ऽक॒रः । स॒हस्रा॑ । यः । श॒तऽम॑घः । इन्द्रः॑ । यः । पूः॒ऽभित् । आ॒रि॒तः ॥ ८.३३.५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:5


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सुक्रतु- पूर्भित्' इन्द्र

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (सुषव्यः सुदक्षिणः) = उत्तम बायें व दायें हाथवाले हैं अथवा (सुषव्यः) = उत्तमता से जगत् का निर्माण करनेवाले हैं और उत्तम दान देनेवाले हैं। (इनः) = स्वामी हैं । (यः सुक्रतुः) = जो शोभन प्रज्ञा व शक्तिवाले हैं । (गृणे) = वे प्रभु हमारे से स्तुति किये जाते हैं। [२] (यः) = जो (सहस्रा आकरः) = हजारों लोक-लोकान्तरों को बनानेवाले हैं। (यः शतामघः) = जो सैंकड़ों ऐश्वर्योंवाले हैं। (यः) = जो (इन्द्रः) = शत्रुओं का विदारण करनेवाले वे प्रभु आरितः स्तुति द्वारा प्राप्त हुए हुए [ऋ गतौ] पूर्भित्-काम-क्रोध-लोभ रूप शत्रुओं की पुरियों का विदारण करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस अनन्त शक्ति व अनन्त प्रज्ञावाले प्रभु का स्मरण करें, जो स्तुति किये जाने पर सब अध्यात्म शत्रुओं का विध्वंस करनेवाले हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I sing and celebrate the glory of Indra who is generous with both hands right and left, magnificent, holy in action, treasure home of a thousandfold riches, who commands a hundredfold power, honour and excellence and who breaks down the strongholds of evil, darkness and suffering. Indeed he is glorious and adorable.