वांछित मन्त्र चुनें
402 बार पढ़ा गया

कण्वे॑भिर्धृष्ण॒वा धृ॒षद्वाजं॑ दर्षि सह॒स्रिण॑म् । पि॒शङ्ग॑रूपं मघवन्विचर्षणे म॒क्षू गोम॑न्तमीमहे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kaṇvebhir dhṛṣṇav ā dhṛṣad vājaṁ darṣi sahasriṇam | piśaṅgarūpam maghavan vicarṣaṇe makṣū gomantam īmahe ||

पद पाठ

कण्वे॑भिः । धृ॒ष्णो॒ इति॑ । आ । धृ॒षत् । वाज॑म् । द॒र्षि॒ । स॒ह॒स्रिण॑म् । पि॒शङ्ग॑ऽरूपम् । म॒घ॒ऽव॒न् । वि॒ऽच॒र्ष॒णे॒ । म॒क्षु । गोऽम॑न्तम् । ई॒म॒हे॒ ॥ ८.३३.३

402 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:3


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्ञान-बल-धन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (धृष्णो) = शत्रुओं का धर्षण करनेवाले प्रभो ! (कण्वेभिः) = विद्वानों के द्वारा (आधृषत्) = आप हमारे शत्रुओं का धर्षण कीजिये। उनसे ज्ञान प्राप्त करके हम काम-क्रोध आदि शत्रुओं को जीतनेवाले बनें। आप हमारे लिये (सहस्रिणं वाजम्) = सहस्रों शत्रुओं का पराजय करने में समर्थ बल को दर्षि दीजिये। [२] हे (विचर्षणे) = [विद्रष्टः] हमारा विशेषरूप से ध्यान करनेवाले (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! हम (मक्षू) = शीघ्र (पिशङ्ग रूपम्) = उज्ज्वल रूपवाले, (गोमन्तम्) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले धन को (ईमहे) = माँगते हैं। हमारे लिये आप उस धन को प्राप्त कराइये जो हमें तेजस्वी बनाये, हमारी इन्द्रियों को सशक्त करे। यह धन हमें विलास में ले जाकर अशक्त करनेवाला न हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानियों के सम्पर्क में ज्ञान को प्राप्त करके वासनाओं को कुचल डालें। प्रभु हमें हजारों शत्रुओं को पराभूत करनेवाले बल को दें। हमें वह धन दें, जो हमें तेजस्वी व प्रशस्त इन्द्रियोंवाला बनाये।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of universal vision, resolute will and irresistible action, ruler and commander of the world’s wealth, power and force, we pray, conceive, plan and bring about for the intelligent people of action and ambition a social order of golden beauty and progressive achievement, full of a hundred-fold prosperity of lands and cows, education and culture, and invincible will, strength and advancement free from indecision and delay in action.