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वृष॑णस्ते अ॒भीश॑वो॒ वृषा॒ कशा॑ हिर॒ण्ययी॑ । वृषा॒ रथो॑ मघव॒न्वृष॑णा॒ हरी॒ वृषा॒ त्वं श॑तक्रतो ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vṛṣaṇas te abhīśavo vṛṣā kaśā hiraṇyayī | vṛṣā ratho maghavan vṛṣaṇā harī vṛṣā tvaṁ śatakrato ||

पद पाठ

वृष॑णः । ते॒ । अ॒भीश॑वः । वृषा॑ । कशा॑ । हि॒र॒ण्ययी॑ । वृषा॑ । रथः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । वृष॑णा । हरी॒ इति॑ । वृषा॑ । त्वम् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो ॥ ८.३३.११

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:9» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:11


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शरीर-रथ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! आपने हमें यह शरीर रथ दिया है। इसमें (ते) = आपसे दी गयी (अभीशवः) = चित्तवृत्ति रूप रश्मियाँ [लगामें] (वृषण:) = शक्तिशाली हैं। यह (हिरण्ययी) = ज्योतिर्मयी (कशा) = वाणी रूप चाबुक भी (वृषा) = शक्तिशाली व सुखवर्षक है। [२] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (रथः) = आपका दिया हुआ यह शरीर रथ वृषा शक्तिशाली है। इसमें जुते हुए (हरी) = इन्द्रियरूप अश्व (वृषणा) = शक्तिशाली हैं। हे (शतक्रते) = अनन्त प्रज्ञान व कर्मोंवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप इन सब वसुओं को देकर हमारे लिये (वृषा) = सुखों के वर्षक होते हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु ने यह शरीर रथ हमें जीवनयात्रा की पूर्ति के लिये दिया है। इसमें चित्तवृत्तियाँ लगाम हैं, ज्योतिर्मयी वाणी चाबुक है, इन्द्रियाश्व घोड़े हैं। ये सब के सब शक्तिशाली हैं। प्रभु देकर हमारे पर अनन्त सुखों का वर्षण करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord of the power, wealth and glory of the universe, agent of infinite acts of creation in the world of existence, strong and golden are the reins of your cosmic chariot, golden is the goad that maintains and controls the speed of its motion, strong and laden with riches is your chariot, strong and virile the motive powers, and you yourself are all potent and generous.$(This mantra may be interpreted as a description of the human soul in its own individual sphere provided that it is self-controlled and free from external forces which bind it in the fetters of worldly interests of a selfish and transitory nature.)