पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ये) = जो (देवासः) = दिव्य गुण (इह स्थम) = इस हमारे जीवन में होते हैं, वे (विश्वे) = सब (वैश्वानराः) = मनुष्यों का हित करनेवाले हैं। दिव्य गुण जिस व्यक्ति के जीवन में होते हैं, उसी का कल्याण न करके सभी का कल्याण करते हैं। इनका प्रभाव उस सारे वातावरण पर ही पड़ता है। [२] उत और हे देवो ! आप (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (सप्रथः) = अतिशयेन विस्तारवाले (शर्म) = सुख को (यच्छत) = दीजिये। हमारे (गवे अश्वाय) = गौ, घोड़े आदि पशुओं के लिये भी ये कल्याण- कर प्रभाववाले हों। अथवा (गवे) = हमारी ज्ञानेन्द्रियों तथा अश्वाय कर्मेन्द्रियों के लिये ये कल्याणकर हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-दिव्य गुणों के धारण से आसपास के सारे वातावरण पर सुखद प्रभाव होता है। ये दिव्य गुण हमारे लिये तथा हमारे गवादिक पशुओं के लिये भी सुखकर हों। अगले सूक्त का ऋषि भी मनु वैवस्वत ही है-