इति॑ स्तु॒तासो॑ असथा रिशादसो॒ ये स्थ त्रय॑श्च त्रिं॒शच्च॑ । मनो॑र्देवा यज्ञियासः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
iti stutāso asathā riśādaso ye stha trayaś ca triṁśac ca | manor devā yajñiyāsaḥ ||
पद पाठ
इति॑ । स्तु॒तासः॑ । अ॒स॒थ॒ । रि॒शा॒द॒सः॒ । ये । स्थ । त्रयः॑ । च॒ । त्रिं॒शत् । च॒ । मनोः॑ । दे॒वाः॒ । य॒ज्ञि॒या॒सः॒ ॥ ८.३०.२
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:30» मन्त्र:2
| अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:37» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:2
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
रिशादसः - यज्ञियासः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (इति) = इस प्रकार गत मन्त्र में वर्णित रीति से (स्तुतासः) = स्तुति किये गये, हे देवो ! आप (रिशादसः) = [रिशतां हिंसतामसितारः] हिंसक शत्रुओं को हमारे से दूर करनेवाले हो । [२] (ये) = जो आप (त्रयः च त्रिंशत् च) = तीन और तीस, अर्थात् तेंतीस हो वे आप मनोः = मननशील व्यक्ति के (देवा:) = जीवन को द्योतित करनेवाले हो । (यज्ञियासः) = आप संगतिकरण योग्य हो या आदरणीय हो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सब दिव्य गुणों को इसी रूप में सोचना कि इनमें कोई कम आवश्यक नहीं है। ऐसा सोचने पर ये दिव्य गुण हमारे जीवन से दोषों को दूर करते हैं और उसे द्योतित [प्रकाशमय ] कर देते हैं।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Three and thirty Vishvedevas thus sung and adored are destroyers of sin and suffering, and therefore you are lovable and adorable by humanity in all their yajnic acts.
