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वि नो॑ देवासो अद्रु॒होऽच्छि॑द्रं॒ शर्म॑ यच्छत । न यद्दू॒राद्व॑सवो॒ नू चि॒दन्ति॑तो॒ वरू॑थमाद॒धर्ष॑ति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vi no devāso adruho cchidraṁ śarma yacchata | na yad dūrād vasavo nū cid antito varūtham ādadharṣati ||

पद पाठ

वि । नः॒ । दे॒वा॒सः॒ । अ॒द्रु॒हः॒ । अच्छि॑द्रम् । शर्म॑ । य॒च्छ॒त॒ । न । यत् । दू॒रात् । व॒स॒वः॒ । नु । चि॒त् । अन्ति॑तः । वरू॑थम् । आ॒ऽद॒धर्ष॑ति ॥ ८.२७.९

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:32» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:9


शिव शंकर शर्मा

इस ऋचा से प्रार्थना करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रुहः+देवासः) हे द्रोहरहित देवगणो ! (नः) हम लोगों को (अच्छिद्रम्+शर्म) बाधारहित कल्याण और गृह (वि+यच्छत) अच्छे प्रकार दीजिये (यत्+वरूथम्) जिस प्रशंसनीय गृह को (दूरात्) दूर से (अन्तितः) समीप से आकर कोई शत्रु (नू+चित्) कदापि भी (न+आ+दधर्षति) नष्ट-भ्रष्ट न कर सके ॥९॥
भावार्थभाषाः - उत्तमोत्तम वासगृह, यज्ञशाला, धर्मशाला, पाठशाला आदि बनावें और उनसे यथायोग्य काम लेवें ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अच्छिद्रं शर्म

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अद्रुहः) = सब प्रकार के द्रोह की भावना से रहित (देवासः) = देवो ! (नः) = हमारे लिये (अच्छिद्रम्) = सब दोषों से शून्य (शर्म) = गृह को (वियच्छत) प्राप्त कराओ। वस्तुतः हम द्रोहशून्य दिव्य वृत्तियोंवाले बनें, तो हमारे घर बड़े निर्दोष बनते हैं। [२] हे (वसवः) = हमारे निवासों को उत्तम बनानेवाले देवो ! हमें उस (वरूथम्) = रक्षक गृह को प्राप्त कराओ (यत्) = जिसको (न दूरात्) = न तो दूर से (नू चित) = और न ही (अन्तितः) = समीप से कोई भी शत्रु (आदर्धषति) = हिंसित करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारे घर निर्दोष हों। इनमें रहनेवाले द्रोह की भावना से शून्य दिव्य वृत्तिवाले बनें। इनमें किसी प्रकार का दूर व समीप से उपस्थित होनेवाला रोग न आ जाये।

शिव शंकर शर्मा

अनयर्चा प्रार्थयते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अद्रुहः=द्रोहरहिताः। देवासः=विद्वद्गणाः। नः=अस्मभ्यम्। अच्छिद्रम्=बाधारहितम्। शर्म=कल्याणं गृहं च। वि+यच्छत=विशेषेण दत्त। यद्। वरूथम्=गृहम्। हे वसवः=वासयितारो देवाः। नृ+चित्=कदाचिदपि। दूरात्। अन्तितः=अन्तिकदेशाद्वा। कश्चिदागत्य। न+आदधर्षति= नोत्खातयेत=न भङ्क्तुं शक्नुयात् ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O brilliant and generous divinities of nature and humanity, Vasus, lord of wealth and providers of home and security, free from jealousy and enmity, pray give us a faultless home, a place of security which no power from far or near might dare to violate or attack and hurt.