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प्र व॑: शंसाम्यद्रुहः सं॒स्थ उप॑स्तुतीनाम् । न तं धू॒र्तिर्व॑रुण मित्र॒ मर्त्यं॒ यो वो॒ धाम॒भ्योऽवि॑धत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra vaḥ śaṁsāmy adruhaḥ saṁstha upastutīnām | na taṁ dhūrtir varuṇa mitra martyaṁ yo vo dhāmabhyo vidhat ||

पद पाठ

प्र । वः॒ । शं॒सा॒मि॒ । अ॒द्रु॒हः॒ । स॒म्ऽस्थे । उप॑ऽस्तुतीनाम् । न । तम् । धू॒र्तिः । व॒रु॒ण॒ । मि॒त्र॒ । मर्त्य॑म् । यः । वः॒ । धाम॑ऽभ्यः । अवि॑धत् ॥ ८.२७.१५

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:15 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:33» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:15


शिव शंकर शर्मा

यह प्रार्थना विद्वानों की गोष्ठी के लाभ के लिये है।

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रुहः) हे द्रोहरहित हिंसाशून्य विद्वानो ! मैं उपासक (उपस्तुतीनाम्) मनोहर स्तोत्रों के (संस्थे) स्थान में अर्थात् यज्ञादिस्थलों में (वः) तुम्हारी ही (प्रशंसामि) प्रशंसा करता हूँ। (वरुण+मित्र) हे वरणीय हे मित्र विद्वानो ! (यः) जो मनुष्य (धामभ्यः) मन, वचन और कार्य से (वः+विधत्) तुम्हारी सेवा करता है, (तम्+मर्त्यम्) उस मनुष्य के (धूर्तिः) शत्रुओं की ओर से वध (न) प्राप्त नहीं होता है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - निश्छल निष्कपट हो प्रेम से विद्वानों की सेवा करो और उनसे उत्तमोत्तम शिक्षा ग्रहण करो ॥१५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मित्र- वरुण आदि के तेज का पूजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अद्रुहः) = द्रोह की भावना से शून्य देवो! (उपस्तुतीनाम्) = [उप इत्य स्तुतिर्येषां ] मिलकर स्तुति करने के योग्य (वः) = आपका (संस्थे) = मिलकर बैठने के स्थान इस यज्ञभूमि में (प्रशंसामि) = खूब ही शंसन करता हूँ। [२] हे (मित्र वरुण) = स्नेह व निर्देषता की देवताओ ! (यः) = जो भी पुरुष (वः) = आपके (धामभ्यः) = तेजों के लिये (अविधत्) = पूजन करता है, (तम्) = उस पुरुष को (धूर्तिः न) = हिंसा बाधित नहीं करती । मित्र व वरुण का उपासक कभी हिंसा आदि की भावनाओं का शिकार नहीं होता।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञों में, मिलकर बैठने के स्थानों में 'मित्र व वरुण' आदि देवों का शंसन किया करें। इनका तेज हमें सब हिंसनों से बचानेवाला होगा।

शिव शंकर शर्मा

विद्वद्गोष्ठीलाभाय प्रार्थना।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अद्रुहः=द्रोहशून्याः। उपस्तुतीनाम्=प्रियस्तोत्राणाम्। संस्थे=स्थाने यज्ञे। वः=युष्मान्। प्रशंसामि। हे वरुण=वरणीय ! हे मित्र ! यः पुरुषः। वः=युष्मान्। धामभ्यः=धामभ्यो मनोवचनकायैः। विधत्=परिचरति=सेवते। तं मर्त्यम्। धूर्तिः=वधः। न प्राप्नोति ॥१५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - In the house of prayer and adoration, I exalt you, Vishvedevas, free from jealousy and enmity. O Mitra, loving friend, O Varuna, lord of judgement and wisdom, no fraud, no mischief, no damage can be done to the mortal who dedicates himself with the strength of his body, mind and soul to your light and grace.