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दे॒वासो॒ हि ष्मा॒ मन॑वे॒ सम॑न्यवो॒ विश्वे॑ सा॒कं सरा॑तयः । ते नो॑ अ॒द्य ते अ॑प॒रं तु॒चे तु नो॒ भव॑न्तु वरिवो॒विद॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

devāso hi ṣmā manave samanyavo viśve sākaṁ sarātayaḥ | te no adya te aparaṁ tuce tu no bhavantu varivovidaḥ ||

पद पाठ

दे॒वासः॑ । हि । स्म॒ । मन॑वे । सऽम॑न्यवः । विश्वे॑ । सा॒कम् । सऽरा॑तयः । ते । नः॒ । अ॒द्य । ते । अ॒प॒रम् । तु॒चे । तु । नः॒ । भव॑न्तु । व॒रि॒वः॒ऽविदः॑ ॥ ८.२७.१४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:33» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:14


शिव शंकर शर्मा

इससे विद्वानों का उदारत्व दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (मनवे) ईश्वरीय विभूतियों के मनन और जाननेवाले पुरुष के लिये (विश्वे+देवासः) सब ही विद्वान् (समन्यवः+हि+स्म) समान रीति से प्रीति और सम्मान करते आए हैं और (साकम्+सरातयः) साथ-२ उनको धन, ज्ञान और उत्तमोत्तम शिक्षा भी देते आए हैं। (ते) वे विद्वद्वर्ग (अद्य) आज (अपरम्) और आगामी दिनों में अर्थात् सदा (नः) वर्तमानकालिक हमको (तु+नः+तुचे) और हमारे भावी सन्तान के लिये (वरिवोविदः+भवन्तु) सब प्रकार के सुख पहुँचानेवाले होवें ॥१४॥
भावार्थभाषाः - विद्वद्वर्ग कदापि आलस्य और घृणा न करके प्रजाओं में जा-जाकर सद्विद्या का बीज बोया करें ॥१४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

समन्यवः देवासः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (देवासः) = 'माता, पिता, आचार्य, अतिथि' आदि देव (हि ष्म) = निश्चय से (मनवे) = विचारशील पुरुष के लिये (समन्यवः) = क्रतुवाले होते हैं [मन्यु क्रतु] प्रज्ञान व शक्ति को प्राप्त करानेवाले होते हैं। ये सब (साकम्) = मिलकर (सरातयः) = उसके ज्ञान शक्ति रूप धनों को देनेवाले होते हैं। [२] (ते) = वे सब (अद्य) = आज (नः) = हमारे लिये (वरिवोविदः) = उत्तम धनों को प्राप्त करानेवाले हों। हमारे लिये तो देव धनों को दें ही, (अपरं तु) = और पिछले दिनों में, आगे आनेवाले दिनों में (तुचे) = हमारे सन्तानों के लिये भी ये आचार्य व अतिथिरूप देव उत्तम ज्ञान धनों को दें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- माता, पिता, आचार्य, अतिथि आदि देव हमारे लिये तथा हमारे आगे आनेवाले सन्तानों के लिये भी ज्ञान व शक्तिरूप धन को प्राप्त करायें।

शिव शंकर शर्मा

विदुषामुदारत्वं दर्शयत्यनया।

पदार्थान्वयभाषाः - मनवे=ईश्वरीयविभूतीनां मन्त्रे विज्ञात्रे च पुरुषाय। विश्वे+देवासः=सर्वे विद्वांसः। समन्यवः=समानमनसः= समानप्रीतयः। हि स्म। साकम्+सरातयः=सार्धमेव दानसहिता भवन्ति। ते देवाः। अद्य=अस्मिन् दिने। ते। अपरम्=आगामिषु च दिवसेषु। नः=अस्माकम्। तु=पुनः। नस्तुचे=अस्माकमपत्याय च। वरिवोविदः=वरिवसां धनानां लम्भयितारः। भवन्तु ॥१४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - All divinities of the world in nature and humanity, all together with gifts of wealth, knowledge and excellence, with equal mind and intention, have been generous to men of holy thought and noble purpose in search of divinity. May they be, today and ever in future, givers of the best of life’s wealth for us and our future generations in peace and plenty.