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उदु॒ ष्य व॑: सवि॒ता सु॑प्रणीत॒योऽस्था॑दू॒र्ध्वो वरे॑ण्यः । नि द्वि॒पाद॒श्चतु॑ष्पादो अ॒र्थिनोऽवि॑श्रन्पतयि॒ष्णव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ud u ṣya vaḥ savitā supraṇītayo sthād ūrdhvo vareṇyaḥ | ni dvipādaś catuṣpādo arthino viśran patayiṣṇavaḥ ||

पद पाठ

उत् । ऊँ॒ इति॑ । स्यः । वः॒ । स॒वि॒ता । सु॒ऽप्र॒नी॒त॒यः । अस्था॑त् । ऊ॒र्ध्वः । वरे॑ण्यः । नि । द्वि॒ऽपादः॑ । चतुः॑ऽपादः । अ॒र्थिनः । अवि॑श्रन् । प॒त॒यि॒ष्णवः॑ ॥ ८.२७.१२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:12 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:33» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:12


शिव शंकर शर्मा

सूर्य्य के समान अनलस हो, यह इससे शिक्षा देते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुप्रणीतयः) हे शोभननीतिविशारद विद्वानो ! (वः) आप लोगों के हित के लिये (उ) निश्चय (वरेण्यः) सर्वश्रेष्ठ (ऊर्ध्वः) और सर्वोपरि विराजमान (स्यः+सविता) वह सूर्य्य (उद्+अस्थात्) उदित होता है, तब (द्विपादः) द्विचरण मनुष्य (चतुष्पादः) चतुश्चरण गो महिषादि पशु और (पतयिष्णवः) उड्डयनशील पक्षी प्रभृति एवं अन्यान्य सब ही जीव (अर्थिनः) निज-२ प्रयोजन के अभिलाषी होकर (नि+अविश्रन्) अपने-२ कार्य्य में लग पड़ते हैं। इसी प्रकार आप भी अपने कार्य्य के लिये सन्नद्ध हो जावें ॥१२॥
भावार्थभाषाः - जो जन प्रणीति=प्रणयन रचना में निपुण हैं, वे भी सुप्रणीति कहाते हैं या जिनके लिये स्तुतिवचन अच्छे हैं, वे सुप्रणीति विद्वद्वर्ग। प्रायः विद्वज्जन आलसी होते हैं, अतः उनको आलस्यत्याग के लिये यह शिक्षा दी गई है ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्य के द्वारा 'सरण' की प्रेरणा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सुप्रणीतयः) = उत्तम मार्ग से जीवन का प्रणयन करनेवाले, शुभ मार्ग से चलनेवाले मनुष्यो ! (स्यः) = वह (वः सविता) = तुम्हें कर्मों में प्रेरणा देनेवाला सूर्य (उ) = निश्चय से (उद् अस्थात्) = उदय हुआ है। (ऊर्ध्व:) = यह ऊपर गतिवाला सूर्य (वरेण्यः) = वरणीय है, सम्भजनीय है। इसका सम्भजन यही है कि हम भी ऊर्ध्वगतिवाले हों। [२] इस सूर्य के उदय होते ही (द्विपादः) = दो पाँवोंवाले मनुष्य, (चतुष्पादः) = चार पाँवोंवाले पशु, (आर्थिनः) = भिन्न-भिन्न प्रयोजनोंवाले अथवा धन को चाहनेवाले लोग तथा (पतयिष्णवः) = आकाश में उत्पतनवाले ये पक्षी (नि आविश्रत्) = [स्व स्व कर्मणि निविशन्ते] अपने-अपने कार्य में निविष्ट हो जाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सूर्योदय होता है। सभी मनुष्य व पशु-पक्षी अपने-अपने कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं। सूर्य के सरण से हमें भी गतिशीलता की प्रेरणा लेनी है।

शिव शंकर शर्मा

सूर्य्य इवानलसो भवेत्यनया शिक्षते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सुप्रणीतयः=हे शोभननीतिविशारदा विद्वांसः ! वः=युष्माकम्। हिताय। उ=निश्चयेन। वरेण्यः=वरणीयः= श्रेष्ठः। ऊर्ध्वः=उपरि विराजमानः। स्य=सः। सविता=सूर्य्यः। उदस्थाद्=उदेति। तदा द्विपादः। चतुष्पादः। पतयिष्णवः= पतनशीला विहगादयश्च। अर्थिनः=स्वस्वप्रयोजनायाभिलाषिणो भूत्वा। न्यविश्रन्=स्वस्वकार्य्येषु निविशन्ते। तथा यूयमपि स्वस्वकार्य्याय सन्नद्धा भवतेत्यर्थः ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O noble divinities of holy thought, intention and policy, when the lord of light and life, the sun, which is the love and choice of all, rises high up in heaven, then the humans, animals and birds all go about in pursuit of their daily business.