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इ॒दा हि व॒ उप॑स्तुतिमि॒दा वा॒मस्य॑ भ॒क्तये॑ । उप॑ वो विश्ववेदसो नम॒स्युराँ असृ॒क्ष्यन्या॑मिव ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

idā hi va upastutim idā vāmasya bhaktaye | upa vo viśvavedaso namasyur ām̐ asṛkṣy anyām iva ||

पद पाठ

इ॒दा । हि । वः॒ । उप॑ऽस्तुतिम् । इ॒दा । वा॒मस्य॑ । भ॒क्तये॑ । उप॑ । वः॒ । वि॒श्व॒ऽवे॒द॒सः॒ । न॒म॒स्युः । आ । असृ॑क्षि । अन्या॑म्ऽइव ॥ ८.२७.११

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:33» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:11


शिव शंकर शर्मा

अभीष्ट वस्तुओं के लाभ के लिये नवीन-२ प्रार्थना बनानी चाहिये, यह उपदेश देते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्ववेदसः) हे सर्वधनसम्पन्न विद्वानो ! (वः) आप लोगों के निकट (वामस्य+भक्तये) अतिकमनीय वस्तु की प्राप्ति के लिये (नमस्युः) नमस्कारपूर्वक या अभीष्टकामी मैं उपासक (इदा+हि) इस समय ही (इदा) इसी समय (वः) आप लोगों के लिये (अन्याम्+इव) अन्यान्य अक्षयधारा नदी के समान (उपस्तुतिम्) इस मनोहर प्रार्थना को (उप+आ+असृक्षि) विधिपूर्वक रच रहा हूँ। कृपया इसे ग्रहणकर प्रसन्न हूजिये ॥११॥
भावार्थभाषाः - नवीन-२ स्तुतिरचना करने में अनेक लाभ हैं। प्रथम तो अपनी वाणी पवित्र होती, वारंवार विचारने से अन्तःकरण शुद्ध होता है, साहित्य की उन्नति और भावी सन्तान के लिये सुपथ बनता जाता है ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दिव्य गुणों का धारण प्रभु-भजन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (विश्ववेदसः) = सम्पूर्ण ज्ञानों व धनों को प्राप्त करानेवाले देवो! [विश्वं वेदः यस्मात्] मैं (इदा हि) = अभी ही (वः) = आप की (उपस्तुतिम्) = समीप आसीन होकर स्तुति को (उप आ असृक्षि) = निर्मित करता हूँ, आपका स्तवन करता हूँ। इन देवों का स्तवन हमें भी देववृत्ति का बनाता है। यह स्तवन (इदा) = अब (वामस्य) = उस सर्वोत्तम, सुन्दरतम प्रभु के (भक्तये) = भजन के लिये हो जाता है। [२] हे देवो! मैं आपकी (अन्यां इव) = असाधारण ही पहले औरों से न की गई, औरों से विलक्षण स्तुति को करता हूँ। मैं आपकी क्रियात्मक स्तुति करता हूँ, आपको अपनाता हुआ आपका स्तोता बनता हूँ । (नमस्युः) = इस स्तुति के द्वारा मैं प्रभु के प्रति नमन की भावनावाला होता हूँ। जितना-जितना मैं दिव्य गुणों को अपनाता हूँ, उतना उतना ही विनत बनता जाता हूँ, विनित बनना ही तो प्रभु का बनना है। यह विनीतता मुझे प्रभु के समीप पहुँचाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-दिव्य गुणों का स्तवन करते हुए हम प्रभु के उपासक बन जायें। दिव्य गुणों का स्तवन व अपनाना ही प्रभु के प्रति नमन है।

शिव शंकर शर्मा

ईप्सितवस्तुलाभाय प्रार्थनारचनोपदेशः।

पदार्थान्वयभाषाः - हे विश्ववेदसः=निखिलधनसम्पन्ना देवाः। नमस्युः= नमस्कारयुक्तो नम्रः सन् अन्नमिच्छन् वा। अहमुपासकः। वः=युष्माकम्। वामस्य=वननीयस्य=कमनीयस्य वस्तुनः। भक्तये=भजनाय=लाभाय। इदा=इदानीम्। हि=एव। इदा=इदानीमेव। वः=युष्माकम्=युष्मदर्थम्। अन्यामिव= अक्षयधारां नदीमिव। उपस्तुतिम्=मनोहरप्रार्थनाम्। उप+आ+असृक्षि=उपासृजामि=विरचयामि। तामादाय प्रसीदतेत्यर्थः ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O divinities of the world who know and command all wealth and honours of life, just now I, searching for new attainments and cherished joys of life with all reverence and humility, compose and offer to you this sincere song of latest adoration like a new stream of spontaneous creation.