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त्वष्टु॒र्जामा॑तरं व॒यमीशा॑नं रा॒य ई॑महे । सु॒ताव॑न्तो वा॒युं द्यु॒म्ना जना॑सः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvaṣṭur jāmātaraṁ vayam īśānaṁ rāya īmahe | sutāvanto vāyuṁ dyumnā janāsaḥ ||

पद पाठ

त्वष्टुः॑ । जामा॑तरम् । व॒यम् । ईशा॑नम् । रा॒यः । ई॒म॒हे॒ । सु॒तऽव॑न्तः । वा॒युम् । द्यु॒म्ना । जना॑सः ॥ ८.२६.२२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:22 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:30» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:22


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शिव शंकर शर्मा

उसका कर्त्तव्य दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुतावन्तः) सदा शोभनकर्म में निरत (जनासः+वयम्) हम सब जन (त्वष्टुः+जामातरम्+ईशानम्) सूक्ष्म कार्य्य के निर्माता और प्रजाओं पर शासक (वायुम्+रायः+ईमहे) सेनानायक से विविध अभ्युदयों की कामना करते हैं और (द्युम्ना) उनकी सहायता से धन, जन, सुयश और धर्म से युक्त होवें ॥२२॥
भावार्थभाषाः - जिन-२ उपायों से देश समृद्ध हो, विद्वानों से और राजसभा से सम्मति लेकर उनको सेनानायक कार्य्य में लावें ॥२२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुतावन्तः - द्युम्नाः-जनासः -ऋषभःङ्क

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (त्वष्टुः जामातरम्) = प्रजापति की, संसार निर्माता प्रभु की अवि [रक्षण शक्ति] के रक्षक, (ईशानम्) = इस प्रकार सब के ईशान [स्वामी] (वायुम्) = वायुदेव से हम (रायः ईमहे) = धनों की याचना करते हैं। वायु से सब ऐश्वर्यों को माँगते हैं। [२] इस प्रकार वायु के प्रिय होते हम (सुतावन्तः) = शरीर में उत्पन्न प्रशस्त सोमवाले होते हैं। (द्युम्नाः) = ज्ञान-ज्योति को प्राप्त करते हैं। (जनासः) = अपनी सब शक्तियों का विकास कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वायु के रक्षण में हम प्रशस्त सोम शक्तिवाले, ज्ञान- ज्योतिवाले व शक्तियों के प्रादुर्भाववाले बनते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

तस्य कर्त्तव्यमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - सुतावन्तः=शोभनकर्माणः। इमे। जनासः=जना वयम्। त्वष्टुर्जामातरम्। ईशानम्=शासकम्। वायुम्। रायः=धनानि। ईमहे=याचामहे। तेन दत्तेन। द्युम्ना=धनेन। धनवन्तः स्याम ॥२२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - For the achievement of wealth, honour and excellence, we, the people dedicated to yajna and the soma of life, adore Vayu, ruler of the world of existence and protector and refiner of things made by the universal maker.