तव॑ वायवृतस्पते॒ त्वष्टु॑र्जामातरद्भुत । अवां॒स्या वृ॑णीमहे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
tava vāyav ṛtaspate tvaṣṭur jāmātar adbhuta | avāṁsy ā vṛṇīmahe ||
पद पाठ
तव॑ । वा॒यो॒ इति॑ । ऋ॒तः॒ऽप॒ते॒ । त्वष्टुः॑ । जा॒मा॒तः॒ । अ॒द्भु॒त॒ । अवां॑सि । आ । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥ ८.२६.२१
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:21
| अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:30» मन्त्र:1
| मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:21
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शिव शंकर शर्मा
उसके गुण प्रकट करते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतस्पते) ईश्वर के सत्यनियमों को पालनेवाले (त्वष्टुः+जामातः) सूक्ष्म से सूक्ष्म कार्य्य के पैदा और निर्माण करनेवाले (अद्भुत) हे आश्चर्यकार्य्यकारी सेनानायक ! (ते+अवांसि+आवृणीमहे) हम सकलजन आपकी रक्षाओं के प्रार्थी हैं ॥२१॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरीय और राजकीय दोनों नियमों को पालन करनेवाले तथा सूक्ष्मकार्यसाधक, जो वीर महावीर वे सेनानायक-योग्य होते हैं ॥२१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
त्वष्टा का जामाता [वायु]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वायो) = वायुदेव ! हम (तव) = आपके (आवांसि) = रक्षणों को (आवृणीमहे) = सर्वथा वरते हैं। सदा शुद्ध वायु के सम्पर्क में होते हुए, शुद्ध वायु में प्राणायाम करते हुए, सब शक्तियों का रक्षण कर पाते हैं। [२] हे वायो ! आप (ऋतस्पते) = रेत: कण रूप जलों के रक्षक हो, प्राणायाम के द्वारा इन शक्तिकणों की ऊर्ध्वगति होती है। (त्वष्टुः जामातः) = संसार के निर्माता प्रभु की पुत्री के तुम रक्षक हो । वायु हमारे जीवनों में 'संज्ञा' का रक्षण करती है, वायु के बन्द होते ही चेतना समाप्त हो जाती है। अद्भुत हे वायो ! हमारे जीवनों के लिये तुम अद्भुत ही हो, वस्तुतः तुम्हीं जीवन हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वायु शरीर में रेतःकण रूप जलों का रक्षक है। जीवन में इसका अद्भुत ही स्थान है ।
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शिव शंकर शर्मा
अस्य गुणान् प्रकटयति।
पदार्थान्वयभाषाः - हे ऋतस्पते=सत्यपालक ! त्वष्टुः=सूक्ष्मकार्य्यस्य। जामातः=जनयितः=निर्मातश्च। हे अद्भुत ! ते=तव। अवांसि=पालनानि। आवृणीमहे ॥२१॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O Vayu, protector and keeper of the universal law of truth and wonderful valuer and refiner of the creations of Tvashta, maker of all fine and gross things of life and destroyer of dangers internal and external, we opt for and choose all your plans and modes of peace, defence and security.
