शुद्ध वायु के सम्पर्क के लाभ
पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'वायु' ही प्राणरूप होकर नासिका में प्रवेश करता है। सो अब वायु से आराधना करते हैं कि हे वायो ! (त्वम्) = तू (हि) = निश्चय से (रथासहा) = शरीर- रथ के वहन में समर्थ इन्द्रियाश्वों को (युक्ष्वा) = शरीर-रथ में जोत । हे (वसो) = वसानेवाले वायुदेव ! तू (पोष्या) = उत्तम पोषणवाले दृढ़ अंगों को (युवस्व) = इस शरीर में मिश्रित कर [मिला]। इस शरीर रथ का एक-एक अंग दृढ़ हो । [२] (आत्) = अब, हे वायो ! (नः) = हमारे (मधु) = सब ओषधियों के सारभूत, भोजन से रस-रुधिर आदि क्रम से उत्पन्न हुए हुए अत्यन्त सारभूत सोम को तू (पिब) = पी, शरीर में ही व्याप्त कर। (अस्माकम्) = हमारे (सवना) = जीवन के 'प्रातः, मध्याह्न व सायं' के तीनों सवनों में (आगहि) = तू हमें प्राप्त हो। हम सदा शुद्ध वायु के सम्पर्क में होते हुए तीनों सवनों में सोम का पान करें, वीर्य का रक्षण करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शुद्ध वायु का सम्पर्क, शुद्ध वायु में होनेवाला प्राणायाम, हमारी इन्द्रियों को सशक्त बनाये, अंगों को दृढ़ करे, सोम को शरीर में सुरक्षित करे तथा दीर्घजीवन प्राप्त कराये।