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यत्त्वा॑ पृ॒च्छादी॑जा॒नः कु॑ह॒या कु॑हयाकृते । ए॒षो अप॑श्रितो व॒लो गो॑म॒तीमव॑ तिष्ठति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yat tvā pṛcchād ījānaḥ kuhayā kuhayākṛte | eṣo apaśrito valo gomatīm ava tiṣṭhati ||

पद पाठ

यत् । त्वा॒ । पृ॒च्छात् । ई॒जा॒नः । कु॒ह॒या । कु॒ह॒या॒ऽकृ॒ते॒ । ए॒षः । अप॑ऽश्रितः । व॒लः । गो॒ऽम॒तीम् । अव॑ । ति॒ष्ठ॒ति॒ ॥ ८.२४.३०

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:24» मन्त्र:30 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:20» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:30


शिव शंकर शर्मा

शुभकर्म का फल दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (कुहयाकृते) हे जिज्ञासु ! हे विद्वन् ! (ईजानः) जो पुरुष यज्ञ कर चुका है, वह (कुहया) इस समय कहाँ है। (यत्+पृच्छात्+त्वा) यदि तुझको इस तरह से कोई पूछे, तो इस प्रकार कहना। (एषः+वलः) यह वरणीय यजमान (अपश्रितः) इस स्थान से चला गया और जाकर (गोमतिम्+अपतिष्ठति) गवादिपशुयुक्त भूमि के ऊपर विद्यमान है ॥३०॥
भावार्थभाषाः - यज्ञों के फलों में सन्देह नहीं करना चाहिये, यह इससे दिखलाते हैं। जो शुभकर्म करते हैं, वे अच्छे फल पाते हैं ॥३०॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

गोमती पर अवस्थान

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (कुहया कुहयाकृते) = [कुहया-कुहया कृतिः यस्य] हे आश्चर्यों और आश्चर्यों को करनेवाले, जादू भरे ब्रह्माण्ड को बनानेवाले प्रभो ! (यत्) = जब (ईजानः) = यज्ञशील पुरुष (त्वा पृच्छात्) = आपके विषय में जिज्ञासावाला होता है, तो (एषः) = यह (अपश्रितः) = विषय-वासनाओं से दूर हुआ- हुआ (वलः) = [वरः] काम-क्रोध-लोभ का निवारण करनेवाला जिज्ञासु (गोमतीम्) = प्रशस्त ज्ञान की वाणियोंवाली वेदमाता के समीप (अवतिष्ठिति) = अवस्थित होता है, नम्रता से स्थित होता है। [२] संसार को आश्चर्यमय रचनाओं से भरा हुआ देखकर उपासक प्रभु विषयक जिज्ञासावाला बनता है। यह जिज्ञासा उसे विषय-वासनाओं से ऊपर उठाती है। काम-क्रोध-लोभ से दूर होता हुआ यह उपासक स्वाध्याय प्रवृत्त होता है। इस स्वाध्याय के द्वारा यह अपने जीवन को और अधिक पवित्र करता हुआ प्रभु-दर्शन करनेवाला बनता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनें। हमारे में प्रभु-विषयक जिज्ञासा हो। यह जिज्ञासा हमें सत्पथ पर प्रवृत्त करेगी। हम स्वाध्यायशील बनकर वेदमाता के चरणों में स्थित होकर पिता प्रभु के प्रिय बन पायेंगे। अगले सूक्त का ऋषि भी 'विश्वमना वैयश्व' ही है। यह मित्रावरुणौ की आराधना करता है। 'मित्रावरुणा' का भाव स्नेह व निद्वेषता का धारण करना है। ये प्राणापान का भी द्योतन करते हैं-

शिव शंकर शर्मा

शुभकर्मफलं दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे कुहयाकृते=हे जिज्ञासो ! ईजानः=इष्टवान् पुरुषः। कुहया=क्व सम्प्रति वर्तते। यद्=यदि एवंविधं प्रश्नम्। त्वा=त्वाम्। पृच्छात्=पृच्छेत। तर्ह्येतद्वाच्यम्। एषः। वलः=वरणीयः। स यजमानः। अपश्रितः=अस्मात् स्थानात् गतः। गत्वा च। गोमतीम्=गवादिपशुयुक्तां भूमिमाश्रित्य। अवतिष्ठति ॥३०॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O seeker of the where and why of active life, if someone were to ask you where the yajaka of love and non-violence is, then say: This man of yajnic dynamism is gone and lives in the region of lands and cows, culture and enlightenment.