वांछित मन्त्र चुनें

याभि॑: प॒क्थमव॑थो॒ याभि॒रध्रि॑गुं॒ याभि॑र्ब॒भ्रुं विजो॑षसम् । ताभि॑र्नो म॒क्षू तूय॑मश्वि॒ना ग॑तं भिष॒ज्यतं॒ यदातु॑रम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yābhiḥ paktham avatho yābhir adhriguṁ yābhir babhruṁ vijoṣasam | tābhir no makṣū tūyam aśvinā gatam bhiṣajyataṁ yad āturam ||

पद पाठ

याभिः॑ । प॒क्थम् । अव॑थः । याभिः॑ । अध्रि॑ऽगुम् । याभिः॑ । ब॒भ्रुम् । विऽजो॑षसम् । ताभिः॑ । नः॒ । म॒क्षु । तूय॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् । भि॒ष॒ज्यत॑म् । यत् । आतु॑रम् ॥ ८.२२.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:22» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:6» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:10


544 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनः राजकर्मों की शिक्षा देते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे राजन् तथा मन्त्रिन् ! (याभिः) जिन रक्षाओं से आप (पक्वम्) शास्त्रों तथा व्यवहारों में परिपक्व और निपुण जन की (अवथः) रक्षा करते हैं, (याभिः) जिन रक्षाओं से (अध्रिगुम्) चलने में असमर्थ पङ्गु की रक्षा करते हैं, (याभिः) जिन रक्षाओं से (बभ्रुम्) अनाथों के भरण-पोषण करनेवाले की तथा (विजोषसम्) विशेषप्रीतिसम्पन्न पुरुष की रक्षा करते हैं, (ताभिः) उन रक्षाओं से (नः) हमारी रक्षा करने को (मक्षु) शीघ्र (तूयम्) शीघ्र ही (आगतम्) आवें तथा (यद्) यदि कोई रोगी हो, तो उस (आतुरम्) आतुर पुरुष की (भिषज्यतम्) दवा कीजिये ॥१०॥
भावार्थभाषाः - महामात्य राजा सब प्रकार के मनुष्यों=अन्ध, बधिर, पङ्गु इत्यादिकों और प्राणियों की रक्षा करे-करावे तथा सर्वत्र औषधालय स्थापित कर रोगियों की चिकित्सा का प्रबन्ध करे ॥१०॥
544 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अश्विना) हे व्यापक गतिवाले ! (याभिः) जिन औषधों से आप (पक्थम्, अवथः) परिपक्व शरीरवालों की रक्षा करते हैं (याभिः) और जिनसे (अध्रिगुम्) शीघ्रगतिवाले अर्थात् जिनकी गति को कोई पा नहीं सकता, ऐसे बलिष्ठ पुरुषों की रक्षा करते हैं (याभिः) जिन ओषधियों से (बभ्रुम्, विजोषसम्) विशेष करके सब प्राणियों पर प्रेम रखनेवाले तथा सब जीवों का भरण-पोषण करनेवाले मनुष्यों की रक्षा करते हैं, (ताभिः) उन्हीं ओषधियों से (नः, यत्, आतुरम्) हम लोगों में जो रोगग्रस्त हैं, उसकी (मक्षु, भिषज्यतम्) शीघ्र चिकित्सा करें और उसके लिये (तूयम्, आगतम्) शीघ्र ही आएँ ॥१०॥
भावार्थभाषाः - इस मन्त्र में रोगनिवृत्ति अर्थात् रोगियों को निरोग करने के लिये न्यायाधीश तथा सेनाधीश से प्रार्थना कथन की गई है कि आप वृद्ध, युवा तथा बालकों की चिकित्सा का पूर्ण प्रबन्ध करें, ताकि सब नीरोगावस्था में रहकर अपने कर्तव्य का पालन करते रहें, या यों कहो कि सब प्रजाजन उद्योगी होकर जीवन व्यतीत करें, निरुद्यमी होकर नहीं ॥१०॥
544 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

भिषज्यतं यद् आतुरम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (याभिः) = जिन रक्षणों के द्वारा (पक्थम्) = ज्ञानाग्नि में अपने को परिपक्व करनेवाले को आप (अवथः) = रक्षित करते हो। (याभिः) = जिन रक्षणों से अध्रिगुम्-अधृत गमनवाले, न्याय मार्ग पर निरन्तर आगे बढ़नेवाले व्यक्ति का आप रक्षण करते हो। और (याभिः) = जिन रक्षणों से (बभ्रुम्) = भरण करनेवाले को पालन-पोषण करनेवाले को व (विजोषसम्) = विशिष्ट प्रीति से कर्त्तव्यों का सेवन करनेवाले को रक्षित करते हो। हे (अश्विना) = प्राणापानो! (ताभिः) = उन रक्षणों के साथ (नः) = हमें (मक्षू) = शीघ्र, (तूयम्) = त्वरा के साथ (आगतम्) = प्राप्त होवो । प्राणापान ही वस्तुतः हमें 'पक्थ-अध्रिगु- बभ्रु व विजोषस' बनाते हैं। [२] हे प्राणापानो! आप हमें प्राप्त होवो और (यद्) = जो भी हमारा अंग-प्रत्यंग (आतुरम्) = रुग्ण हो, उसे (भिषज्यतम्) = चिकित्सित करो। प्राणापान ही सर्वमहान् वैद्य हैं, ये सब रोगों को दूर करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्राणसाधना से हम 'परिपक्व ज्ञानवाले, न्याय मार्ग पर आगे बढ़नेवाले, ठीक से भरण-पोषण करनेवाले व प्रीतिपूर्वक कर्त्तव्य का सेवन करनेवाले' बनते हैं। ये प्राणापान सब रुग्ण अंगों को नीरोग बनाते हैं।
544 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनः राजकर्माणि शिक्षते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे अश्विनौ=राजानौ ! याभिरूतिभिः=रक्षाभिः। युवाम्। पक्वम्=शस्त्रेषु व्यवहारादिषु च परिपक्वं निपुणं नरम्। अवथः=रक्षथः। याभी रक्षाभिः। अध्रिगुम्=अधृतगमनं पङ्गुम्। अवथः। याभी रक्षाभिः। बभ्रुम्=अनाथभर्तारम्। अवथः। तथा। विजोषसम्= अविशेषेण प्रीतिसम्पन्नं पुरुषम्। अवथः। ताभिरूतिभिः। नोऽस्मान् रक्षितुं। मक्षु=शीघ्रम्। तूयम्=शीघ्रमेव। आगतम्=आगच्छतम्। तथा। यद् यदि कश्चिदातुरो रोगी तमातुरम्। भिषज्यतम्=चिकित्सतम् ॥१०॥
544 बार पढ़ा गया

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (आश्विना) हे अश्विनौ ! (याभिः) याभिरोषधिभिः (पक्थम्, अवथः) परिपक्वशरीरो यो दृश्यते तं रक्षथः (याभिः, अध्रिगुम्) याभिश्च अधृतगमनं बलातिशयाच्छीघ्रगामिनं रक्षथः (याभिः) याभिश्च (बभ्रुम्, विजोषसम्) विशेषेण जोषसम्=सर्वप्राणिप्रियंकरम् अन्नादिभिर्भरणशीलं जनं च अवथः (ताभिः) ताभिरेवोषधीभिः (नः, यत्, आतुरम्) अस्मासु यो रुग्णस्तम् (मक्षु, भिषज्यतम्) शीघ्रं चिकित्सेथाम्, तदर्थं च (तूयम्, आगतम्) क्षिप्रमागच्छतम् ॥१०॥
544 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Ashvins, rulers and administrators of the social system of health and security, come with those protections and securities by which you protect and maintain the healthy veterans of knowledge and practical action, by which you assist the disabled and help the support system for the weak and the destitute. Come fast without delay to sustain the weak and suffering in a state of emergency and provide them medical aid.