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वी॒ळु॒प॒विभि॑र्मरुत ऋभुक्षण॒ आ रु॑द्रासः सुदी॒तिभि॑: । इ॒षा नो॑ अ॒द्या ग॑ता पुरुस्पृहो य॒ज्ञमा सो॑भरी॒यव॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vīḻupavibhir maruta ṛbhukṣaṇa ā rudrāsaḥ sudītibhiḥ | iṣā no adyā gatā puruspṛho yajñam ā sobharīyavaḥ ||

पद पाठ

वी॒ळु॒प॒विऽभिः॑ । म॒रु॒तः॒ । ऋ॒भु॒क्ष॒णः॒ । आ । रु॒द्रा॒सः॒ । सु॒दी॒तिऽभिः॑ । इ॒षा । नः॒ । अ॒द्य । आ । ग॒त॒ । पु॒रु॒ऽस्पृ॒हः॒ । य॒ज्ञम् । आ । सो॒भ॒री॒ऽयवः॑ ॥ ८.२०.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:20» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:1» वर्ग:36» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:3» मन्त्र:2


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शिव शंकर शर्मा

सेनाएँ कैसी हों, यह दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभुक्षणः) हे महान् हे मनुष्यहितकारी (रुद्रासः) हे दुःखविनाशक (पुरुस्पृहः) हे बहु स्पृहणीय (सोभरीयवः) हे सत्पुरुषाभिलाषी सेनाजनों ! आप (वीळुपविभिः) दृढ़तर चक्रादियुक्त (सुदीतिभिः) सुदीप्त रथों से (आ+गत) आवें (इषा) अन्न के साथ (अद्य) आज (आ+गत) आवें (यज्ञम्) प्रत्येक यज्ञ में (आ) आवें ॥२॥
भावार्थभाषाः - सेना को उचित है कि वह प्रजाओं की माननीया हो और उनकी रक्षा अच्छे प्रकार करे ॥२॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभुक्षणः) हे महान् (रुद्रासः) शत्रुओं को रुलानेवाले (पुरुस्पृहः) अनेक मनुष्यों के स्पृहणीय (सोभरीयवः) सम्यग् भरणपोषण करनेवाले मनुष्य को चाहनेवाले (मरुतः) योद्धाओ ! (वीळुपविभिः) दृढ़ रथों द्वारा (आ) आप आवें (नः, यज्ञम्, आ) हमारे यज्ञ के अभिमुख (इषा) इष्ट पदार्थ सहित (आगत) आवें ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे शत्रुओं को रुलानेवाले वीर योद्धाओ ! आप हमारे भरणपोषण करनेवाले पदार्थों सहित हमारे प्रजापालनरूप यज्ञ को शीघ्रगामी रथों द्वारा प्राप्त हों हम आपका सत्कार करते हैं अर्थात् जो योद्धागण धर्मपूर्वक युद्ध करके प्रजाओं के लिये सभ्यता तथा धर्म का राज्य स्थापित करते हैं, प्रजाजनों का कर्तव्य है कि ऐसे वीर पुरुषों की पूजा=सत्कार करने में सदैव तत्पर रहें ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वीडुपविभिः-सुरीतिभिः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (ऋभुक्षणः) = [ उरुभासमान निवासाः] खूब दीप्त निवासवाले, (रुद्रासः) = रोगों का द्रावण करनेवाले (मरुतः) = प्राणो ! (वीडुपविभिः) = दृढ़ रथनेमियोंवाले (सुदीतिभिः) = उत्तम दीप्तियों से युक्त शरीररथों से (आगत) = हमें प्राप्त होवो। आपकी साधना से यह शरीररथ दृढ़ व दीप्तिमय बने । [२] हे (पुरुस्पृहः) = खूब ही स्पृहणीय, (सोभरीयवः) = मुझे सोभरि [उत्तम भरणवाला] बनाने की कामनावाले मरुतो ! (अद्य) = आज (नः यज्ञम्) = हमारे जीवनयज्ञ में (इषा) = उत्तम प्रेरणा के हेतु से (आगत) = प्राप्त होवो। आपकी साधना से ही तो हृदय की शुद्धि होने पर अन्तःस्थित प्रभु की प्रेरणा सुन पड़ती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना से हमारे शरीर दृढ़ व दीप्त बनें। हमें इस जीवनयज्ञ में प्रभु की प्रेरणा सुनाई पड़े। तदनुसार कार्य करते हुए हम 'सोभरि' बनें।
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शिव शंकर शर्मा

कीदृशाः सेना भवेयुरिति दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे ऋभुक्षणः=महान्तः मनुष्यहितकारिणो वा। हे मरुतः=मरुन्नामकाः सैन्यजनाः। हे रुद्रासः=दुःखद्राविणः। हे पुरुस्पृहः=बहुभिः=स्पृहणीयाः। हे सोभरीयवः=सोभरीन्=सुभरीन् सत्पुरुषान् ये कामयन्ते ते सोभरीयवः। यूयम्। वीळुपविभिः=दृढतरनेमिभिः। सुदीतिभिः=सुदीप्तैः रथैः। आगच्छत। इषा=अभीष्टेन अन्नेन सह। अद्य। आगत। यज्ञम्=शुभकर्म। आगत=आगच्छत ॥२॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋभुक्षणः) हे महान्तः (रुद्रासः) शत्रूणां रोदयितारः (पुरुस्पृहः) बहुभिः स्पृहणीयः (सोभरीयवः) सुष्ठुभरणशीलान् कामयमानः (मरुतः) योद्धारः ! (वीळुपविभिः) दृढनेमियुक्तैः रथैः (आ) आगच्छत (नः, यज्ञम्, आ) अस्मद्यज्ञाभिमुखम् (इषा) इष्टपदार्थेन (आगत) आगच्छत ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Mighty leaders of will and intelligence, lovers and protectors of the good, destroyers of want and suffering, honoured and invoked by all, come right now at the fastest by blazing chariots of the strongest wheel with forces of thunder and join our yajnic programme of creation and development with abundant food and energy.