'रुद्रस्य सूनवः - युवानः' [मरुतः]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जैसे (रुद्रस्य सूनवः) = रोगों के द्रावयिता के पुत्र, अर्थात् खूब ही रोगों का द्रावण करनेवाले, प्राण (वशन्ति) = चाहते हैं, (इत्) = निश्चय से तथा (असत्) = वैसा ही हो जाता है। अर्थात् शरीर में शासन प्राणों का है। [२] ये प्राण (दिवः) = ज्ञान के प्रकाश के तथा (असुरस्य) = [ असून् एति ] प्राणशक्ति का संचार करनेवाले सोम के (वेधसः) = [विधातारः] कर्ता हैं। इन प्राणों ने ही शक्ति की ऊर्ध्वगति करनी है, तथा उस सुरक्षित सोम को ज्ञानाग्नि का ईंधन बनाकर ज्ञानाग्नि को दीप्त करना है । और इस प्रकार ये प्राण (युवानः) = [यु मिश्रणामिश्रणयोः] सब बुराइयों को पृथक् करनेवाले व सब अच्छाइयों को हमारे साथ मिलानेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- शरीर में प्राण रोगों को दूर भगानेवाले, ज्ञान व सोम के कर्ता तथा सब बुराइयों को दूर करके सब अच्छाइयों को हमारे साथ मिलानेवाले हैं।