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तव॑ द्र॒प्सो नील॑वान्वा॒श ऋ॒त्विय॒ इन्धा॑नः सिष्ण॒वा द॑दे । त्वं म॑ही॒नामु॒षसा॑मसि प्रि॒यः क्ष॒पो वस्तु॑षु राजसि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tava drapso nīlavān vāśa ṛtviya indhānaḥ siṣṇav ā dade | tvam mahīnām uṣasām asi priyaḥ kṣapo vastuṣu rājasi ||

पद पाठ

तव॑ । द्र॒प्सः । नील॑ऽवान् । वा॒शः । ऋ॒त्वियः॑ । इन्धा॑नः । सि॒ष्णो॒ इति॑ । आ । द॒दे॒ । त्वम् । म॒ही॒नाम् । उ॒षसा॑म् । अ॒सि॒ । प्रि॒यः । क्ष॒पः । वस्तु॑षु । रा॒ज॒सि॒ ॥ ८.१९.३१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:19» मन्त्र:31 | अष्टक:6» अध्याय:1» वर्ग:35» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:3» मन्त्र:31


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शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (सिष्णो) हे सुखवर्षिता ईश ! (तव) तेरा (द्रप्सः) द्रवणशील प्रवहणशील संसार (नीलवान्) श्याम अर्थात् सुखप्रद है। (वाशः) कमनीय=सुन्दर है (ऋत्वियः) प्रत्येक ऋतु में अभिनव होता है (इन्धानः) दीप्तिमान् है और (आददे) ग्रहणयोग्य है (त्वम्) तू (महीनाम्) महान् (उषसाम्) प्रातःकाल का (प्रियः+अस्ति) प्रिय है। (क्षपः) रात्रि की (वस्तुषु) वस्तुओं में भी (राजसि) शोभित होता है ॥३१॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा और उसका कार्य्यजगत्, ये दोनों सदा चिन्तनीय हैं। वह इसी में व्याप्त है, उसके कार्य्य के ज्ञान से ही विद्वान् तृप्त होते हैं ॥३१॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (द्रप्सः) द्रवणशील (नीलवान्) अत्युत्तम आधारवाला (वाशः) कमनीय (ऋत्वियः) प्रतिऋतु में उत्पाद्य (इन्धानः) दीप्तिमान् (तव) आपका रस (सिष्णो) हे कामप्रद ! (आददे) यज्ञों में ग्रहण किया जाता है (त्वम्, महीनाम्, उषसाम्) आप सब उषाकालों में (प्रियः, असि) तृप्तिकर हैं (वस्तुषु) सब वस्तुओं में (क्षपः) रसरूप से (राजसि) प्रकाशमान हो रहे हैं ॥३१॥
भावार्थभाषाः - जिस परमात्मा के ब्रह्मानन्द की समता कोई आनन्द नहीं कर सकता और जो शक्तिरूपेण प्रत्येक वस्तु में प्रकाशित हो रहा है, उसका प्रत्येक उषाकल में गान करना प्रत्येक मनुष्य को उचित है ॥३१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यक्ष (केनोपनिषद्)

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सिष्णो) = अपने प्रकाश से हमारे ध्यान को अपनी ओर खेंचनेवाले प्रभो! (तव द्रप्सः) = आपका ज्योतिष्कण [spark] (नीलवान्) = [नील] एक शुभ उद्घोषणावाला है। (वाश:) = यह एक पुकार है। (ऋत्वियः) = यह पुकार उस समय के अनुकूल होती है। (इन्धान:) = मैं अपने अन्दर ज्ञान को दीप्त करता हुआ (आददे) = इस पुकार का ग्रहण करता हूँ। [२] आप मेरे जीवन में (महीनाम्) = पूजा के लिये उचित (उषसाम्) = उषाकालों के तो (प्रियः असि) = प्रिय हैं ही। अर्थात् उषाकालों में तो मैं आपका स्मरण करता ही हूँ। आप (क्षपः) = रात्रि व (वस्तुषु) = दिनों में [वस्तु] (राजसि) = मेरे जीवन में चमकते हैं। अर्थात् मैं दिन-रात आपका स्मरण करता हूँ। यह सदा आपका स्मरण ही मेरे जीवन को पवित्र व प्रकाशमय बनाता है। [३] सर्वत्र प्रभु की ज्योति चमक रही है। विचारक को यह ज्योति अपनी ओर आकृष्ट करती है। वह सदा उस प्रभु का स्मरण करता हुआ अपने जीवन को निरभिमान बना पाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मेरे जीवन में प्रभु की ज्योति चमके प्रभु के ज्योतिष्कण से आकृष्ट होऊँ। दिन- रात प्रभु को स्मरण करता हुआ इस ज्योतिष्कण को लेने का प्रयत्न करूँ।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदनुवर्त्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सिष्णो=सुखवर्षितः परमात्मन् ! सिषिः सेचनार्थः। तव द्रप्सः=द्रवणशीलः संसारः। नीलवान्=श्यामवान्। सुखप्रद इत्यर्थः। वाशः=कमनीयः। ऋत्वियः=ऋतौ ऋतौ अभिनवः। इन्धानः=दीप्तिमान्। ईदृक् संसारः। आददे=आदीयते गृह्यते प्राणिभिः। आदेयोऽस्तीत्यर्थः। महीनाम्। उषसाम्=प्रातःकालानां प्रियोऽसि। उषसि हि परमात्मा ध्यायते। पुनस्त्वम्। क्षपो रात्रेर्वस्तुषु। राजसि=विराजसि। अन्धकारेऽपि तव स्थितिरस्ति ॥३१॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (द्रप्सः) द्रवणशीलः (नीलवान्) प्रशस्तनिवासः (वाशः) कमनीयः (ऋत्वियः) ऋतुषु भावयितव्यः (इन्धानः) दीप्यमानः (तव) तव रसः (सिष्णो) हे कामप्रद ! (आददे) यज्ञेषु गृह्यते (त्वम्, महीनाम्, उषसाम्) त्वम् सर्वासामुषसाम् (प्रियः, असि) तृप्तिकरोऽसि (क्षपः, वस्तुषु) सर्वेषु वस्तुषु रसात्मकः (राजसि) प्रकाशसे ॥३१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, giver of the showers of joy in life, the world of your creation flows on like drops of soma from the press, colourful, crackling voluble, exciting and fresh through the seasons, bright and beautiful, passionately lovable. You are darling of the glory of dawns and you shine ever in the glimmerings of the dusk and reflect in the ripples of water.