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त इद्वेदिं॑ सुभग॒ त आहु॑तिं॒ ते सोतुं॑ चक्रिरे दि॒वि । त इद्वाजे॑भिर्जिग्युर्म॒हद्धनं॒ ये त्वे कामं॑ न्येरि॒रे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ta id vediṁ subhaga ta āhutiṁ te sotuṁ cakrire divi | ta id vājebhir jigyur mahad dhanaṁ ye tve kāmaṁ nyerire ||

पद पाठ

ते । इत् । वेदि॑म् । सु॒ऽभ॒ग॒ । ते । आऽहु॑तिम् । ते । सोतु॑म् । च॒क्रि॒रे॒ । दि॒वि । त् ए । इत् । वाजे॑भिः । जि॒ग्युः॒ । म॒हत् । धन॑म् । ये । त्वे इति॑ । काम॑म् । नि॒ऽ ए॒रि॒रे ॥ ८.१९.१८

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:19» मन्त्र:18 | अष्टक:6» अध्याय:1» वर्ग:32» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:3» मन्त्र:18


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शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे (सुभग) परमसुन्दर देव ! (त इत्) वे ही उपासक (वेदिम्) पूजा के लिये वेदी (चक्रिरे) बनाते हैं, (त इत्) वे ही (आहुतिम्) उस वेदी में आहुति देते हैं, (ते) वे ही (दिवि) दिन-२ (सोतुम्) यज्ञ करने के लिये उद्यत रहते हैं, (त इत्) वे ही (वाजेभिः) ज्ञानों से (महद्+धनम्) बहुत बड़ा धन (जिग्युः) जीतते हैं। हे परमात्मन् ! (ये) जो सर्वभाव से (त्वे) आपमें ही (कामम्) सब कामनाओं को (न्येरिरे) समर्पित करते हैं ॥१८॥
भावार्थभाषाः - धन्य वे नर हैं, जो सदा ईश्वर की आज्ञा पर चलते हुए जगत् के कार्य्यों में लगे रहते हैं ॥१८॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुभग) हे सुन्दरऐश्वर्यवाले परमात्मन् ! (ते, इत्, वेदिम्) वे ही मनुष्य यज्ञभूमि को (ते, आहुतिम्) वे ही आहुति को (ते, दिवि, सोतुम्, चक्रिरे) वे ही दिव्ययज्ञ में अभिषव प्रारम्भ करते हैं (ते, इत्) वे ही (वाजेभिः) बलों सहित (महत्, धनम्) महान् धन को (जिग्युः) जीतकर लब्ध करते हैं, (ये) जो (कामम्) अपने अभिलाष को (त्वे, न्येरिरे) आप में रखते हैं ॥१८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य परमात्माधीन होकर अपने पुरुषार्थ को यज्ञ, परोपकार, बलोपार्जन, धनोपार्जन अथवा संग्राम में लगाते हैं, उन्हीं को यथेष्ट फलसिद्धि होती है अर्थात् परमात्मा के उपासक तथा आज्ञापालक पुरुष ही अपनी कामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं, अन्य नहीं ॥१८॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ-सोम सम्पादन-ऐश्वर्य = का विजय

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (सुभग) = उत्तम ऐश्वर्योंवाले प्रभो ! (ये) = जो लोग (त्वे) = आपके विषय में (कामम्) = इच्छा को (न्येरिरे) = प्रेरित करते हैं, अर्थात् आपको प्राप्त करने की कामनावाले होते हैं, (ते इत्) = वे ही (वेदिम्) = वेदि को, यज्ञभूमि को (चक्रिरे) = बनाते हैं । (ते) = वे ही (आहुतिम्) = [चक्रिरे] वहाँ यज्ञाग्नि में आहुतियों को करते हैं। (ते) = वे दिवि ज्ञान के प्रकाश के निमित्त (सोतुम्) = सोम के सम्पादन के लिये प्रवृत्त होते हैं। सोमरक्षण के द्वारा ही तो वे अपनी ज्ञानाग्नि को दीप्त कर पायेंगे। इस प्रकार प्रभु प्राप्ति की कामनावाले पुरुष यज्ञशील होते हैं और सोम का सम्पादन करते हैं। [२] (ते) = वे यज्ञशील व सोम का सम्पादन करनेवाले व्यक्ति (इत्) = ही (वाजेभिः) = शक्तियों के द्वारा व त्यागों के द्वारा [वाज = sacrifice] (महद्) = महान् (धनम्) = धन का (जिग्युः) = विजय करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु प्राप्ति की कामनावाले लोग यज्ञशील व सोम का सम्पादन करते हैं। ये ही त्याग व शक्ति के द्वारा महान् धन का विजय करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदनुवर्त्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सुभग=परमसुन्दर देव ! त इत्=त एव मनुष्याः। वेदिम्=पूजास्थानम्। चक्रिरे=कुर्वन्ति। त एव। आहुतिम्। चक्रिरे=कुर्वन्ति। त एव। दिवि=दिने दिने। सोतुम्=यज्ञं कर्तुं उद्यता भवन्ति। त इद्=त एव। वाजेभिर्वाजैर्ज्ञानैः सह। महद्धनम्। जिग्युः=जयन्ति। ये उपासकाः। त्वे=त्वयि एव। कामम्=वाञ्छाम्। न्येरिरे=नितरां स्थापयन्ति। त्वय्येव सर्वं समर्पयन्ति ॥१८॥
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आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सुभग) हे स्वैश्वर्य ! (ते, इत्, वेदिम्) त एव यज्ञवेदिम् (ते, आहुतिम्) त एवाहुतिम् (ते, दिवि, सोतुम्, चक्रिरे) त एव दिव्ये यज्ञे सोमरसादि सोतुं प्रक्रमन्ते (ते, इत्) त एव (वाजेभिः) बलैः सह (महत्, धनम्) अतिशयितं धनम् (जिग्युः) लभन्ते जित्वा (ये) ये जनाः (कामम्) स्वाभिलाषम् (त्वे, न्येरिरे) त्वयि निदधति ॥१८॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Lord of glory and divine grace, Agni, they alone in reality organise the yajna vedi, they really offer the oblations into the sacred fire, they in truth endeavour to distil the soma of joy in the light of divinity, they in ultimate terms win the wealth of life by their struggle of life, who concentrate their hopes and ambitions in you and attribute and dedicate all their success, honour and fame to you.