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अन्ति॑ चि॒त्सन्त॒मह॑ य॒ज्ञं मर्त॑स्य रि॒पोः । नोप॑ वेषि जातवेदः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

anti cit santam aha yajñam martasya ripoḥ | nopa veṣi jātavedaḥ ||

पद पाठ

अन्ति॑ । चि॒त् । सन्त॑म् । अह॑ । य॒ज्ञम् । मर्त॑स्य । रि॒पोः । न । उप॑ । वे॒षि॒ । जा॒त॒ऽवे॒दः॒ ॥ ८.११.४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:11» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:35» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

ईश्वर प्रार्थना दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे सर्ववित् ! सर्वधन ईश ! जो (मर्तस्य+रिपोः) मनुष्य जगत् का शत्रु है, उसको (यज्ञम्) यज्ञ यदि (अन्तिचित्+सन्तम्) सर्वगुणसम्पन्न भी हो, तथापि हे ईश ! उस यज्ञ का आप (अह) कदापि भी (न+उप+वेषि) आदर न करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - दुष्टजन और उनके कर्म आदरणीय नहीं हैं ॥४॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे सब कर्मों के ज्ञाता ! (रिपोः, मर्तस्य) शत्रुजन के (अन्ति, चित्, सन्तम्, यज्ञम्) अपने समीप में होनेवाले यज्ञ को भी (न, उपवेषि, अह) आप नहीं ही जानते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे सब चराचर प्राणिजात के शुभाशुभकर्मों को जाननेवाले परमात्मन् ! शत्रुजनों से होनेवाले हिंसारूप यज्ञ को आप नहीं जानते अर्थात् अवश्य जानते हैं, सो आप उसका फल उनको यथायोग्य ही प्रदान करेंगे ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

रिपु से किया गया 'यज्ञ' यज्ञ नहीं

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (जातवेदः) = सर्वज्ञ प्रभो! आप (अन्ति चित् सन्तम्) = अत्यन्त समीप होते हुए भी, अर्थात् अतिप्रिय होते हुए भी (यज्ञम्) = यज्ञ को (अह) = निश्चय से (न उपवेषि) = नहीं चाहते। यह यज्ञ आपको प्रिय नहीं होता, यदि यह (रिपोः मर्तस्य) = शत्रुभूत मनुष्य का होता है। अर्थात् जो मनुष्य औरों के साथ शत्रुता करता रहता है, उसका यज्ञ आपको प्रिय नहीं होता। [२] यज्ञों के द्वारा प्रभु-पूजन अवश्य होता है 'यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः'। परन्तु इन यज्ञों को करते हुए हमें देववृत्ति का बनना है। हम पड़ोसियों के साथ वैरभाव रखते हुए यज्ञों से प्रभु को रिझा नहीं सकते।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम देववृत्ति के बनकर, शत्रुता को तिलाञ्जलि देकर यज्ञों को करें। ये ही यज्ञ हमें प्रभु का प्रिय बनायेंगे।

शिव शंकर शर्मा

ईश्वरप्रार्थनां दर्शयति।

पदार्थान्वयभाषाः - हे जातवेदः=सर्वज्ञ ! रिपोः=संसारशत्रोः। मर्तस्य=दुष्टपुरुषस्य। अन्ति=अन्तिकम्। चिद्=समृद्धमपि। सन्तम्=भवन्तम्। यज्ञम्। न अह=नैव अहशब्द एवार्थः। उपवेषि=कामय ॥४॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे सर्वकार्याणां ज्ञातः ! (रिपोः, मर्तस्य) शत्रुजनस्य (अन्ति, चित्, सन्तम्) समीपे वर्तमानमपि (यज्ञम्) क्रतुम् (न) नहि (उपवेषि) जानासि (अह) हि ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Jataveda, lord omniscient, you do not join or bless the yajna of an enemy of humanity even if the yajna and the performer is said to be close to divinity otherwise.