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यस्मा॒द्रेज॑न्त कृ॒ष्टय॑श्च॒र्कृत्या॑नि कृण्व॒तः । स॒ह॒स्र॒सां मे॒धसा॑ताविव॒ त्मना॒ग्निं धी॒भिः स॑पर्यत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yasmād rejanta kṛṣṭayaś carkṛtyāni kṛṇvataḥ | sahasrasām medhasātāv iva tmanāgniṁ dhībhiḥ saparyata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्मा॑त् । रेज॑न्त । कृ॒ष्टयः॑ । च॒र्कृत्या॑नि । कृ॒ण्व॒तः । स॒ह॒स्र॒ऽसाम् । मे॒धसा॑तौऽइव । त्मना॑ । अ॒ग्निम् । धी॒भिः । स॒प॒र्य॒त॒ ॥ ८.१०३.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:103» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:3


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अग्निं धीभिः सपर्यत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्मात्) = जिस प्रभु से (चर्कृत्यानि कृण्वतः) = कर्त्तव्य कर्मों को करते हुए (कृष्टयः) = श्रमशील मनुष्य (रेजन्त) = दीप्ति को प्राप्त करते हैं [रेज To shine], उस अग्निम् अग्रेणी प्रभु को (धीभिः) = बुद्धिपूर्वक किये जानेवाले कर्मों से (सपर्यत) = पूजो । प्रभु का पूजना कर्मों द्वारा ही होता है। [२] (मेधसातौ) = [मेध यज्ञ, साति = प्राप्ति] यज्ञों के सेवन के होने पर (स्ना इव) = स्वयं ही [एव] बिना किसी अन्य की सहायता के होने पर ही (सहस्त्रसाम्) = अनन्त लाभों के देनेवाले उस प्रभु का पूजन करो। प्रभु ने इन यज्ञों को 'कामधुक्' बनाया है, इनके द्वारा सब इष्टों की पूर्ति होती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु क्रियाशील पुरुषों को दीप्त जीवनवाला बनाते हैं। कर्मों द्वारा ही प्रभु का उपासन होता है। यज्ञों के सेवन के होने पर प्रभु सब इष्ट कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - From that gift of light the children of earth shine and continue doing their daily duties. O people, do service in homage to Agni, giver of light and a thousand other gifts as in yajnic generosity. Do so with your heart and soul, sincerely by thought and action.