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आग्ने॑ याहि म॒रुत्स॑खा रु॒द्रेभि॒: सोम॑पीतये । सोभ॑र्या॒ उप॑ सुष्टु॒तिं मा॒दय॑स्व॒ स्व॑र्णरे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āgne yāhi marutsakhā rudrebhiḥ somapītaye | sobharyā upa suṣṭutim mādayasva svarṇare ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । अ॒ग्ने॒ । या॒हि॒ । म॒रुत्ऽस॑खा । रु॒द्रेभिः॑ । सोम॑ऽपीतये । सोभ॑र्याः॒ । उप॑ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । मा॒दय॑स्व । स्वः॑ऽनरे ॥ ८.१०३.१४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:103» मन्त्र:14 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:15» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:14


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु की मित्रता के लिये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो! आप (आयाहि) = मुझे प्राप्त होइये। (मरुत् सखा) = [मितराविणां सखा] आप कम [मपा तुला] बोलनेवाले क्रियाशील पुरुषों के मित्र हैं। आप (रुद्रेभिः) = रोगों को दूर भगानेवाले इन प्राणों के द्वारा (सोमपीतये) = शरीर में सोम के रक्षण के लिये होते हैं । [२] हे प्रभो! आप (सोभर्या:) = जीवन के कर्त्तव्यों का सम्यक् भरण करनेवाले की (सुष्टुतिम्) = उत्तम स्तुति को (उप) [आयाहि ] = समीपता से प्राप्त होइये, और (स्वर्णरे) = प्रकाशमय लोक को प्राप्त करानेवाले यज्ञों में (मादयस्व) = आनन्दित कीजिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु की मित्रता की प्राप्ति के लिये परिमित बोलनेवाले हों, प्राणसाधना द्वारा सोम का शरीर में रक्षण करें, प्रभु-स्तवन के साथ यज्ञों में आनन्द का अनुभव करें।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, refulgent lord, friend of the mind and senses, come, arise in the heart with pranic energies for the protection and exaltation of the soul’s joy. Come, accept the adorations and prayers of the self-confident celebrant, join his golden yajna and exalt the ecstasy of his communion.