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उदि॑ता॒ यो निदि॑ता॒ वेदि॑ता॒ वस्वा य॒ज्ञियो॑ व॒वर्त॑ति । दु॒ष्टरा॒ यस्य॑ प्रव॒णे नोर्मयो॑ धि॒या वाज॒ सिषा॑सतः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uditā yo niditā veditā vasv ā yajñiyo vavartati | duṣṭarā yasya pravaṇe normayo dhiyā vājaṁ siṣāsataḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत्ऽइ॑ता । यः । निऽदि॑ता । वेदि॑ता । वसु॑ । आ । य॒ज्ञियः॑ । व॒वर्त॑ति । दु॒स्तराः॑ । यस्य॑ । प्र॒व॒णे । न । ऊ॒र्मयः॑ । धि॒या । वाज॑म् । सिसा॑सतः ॥ ८.१०३.११

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:103» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:15» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:11


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

पुण्य-पाप के ज्ञाता प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (उदिता) = हमारे उत्कृष्ट कर्मों को व (निदिता) = निन्दनीय कर्मों को (वेदिता) = जानता है। और उन कर्मों के अनुसार ही वह (यज्ञियः) = पूजनीय प्रभु (वसु आववर्तति) = धनों को समन्तात् प्राप्त कराता है। [२] धिया बुद्धि के साथ (वाजम्) = शक्ति को (सिषासतः) = हमारे लिये सम्भक्त करने की कामनावाले (यस्य) = जिस प्रभु की (ऊर्मयः) = ज्ञानदीप्तियाँ [ऊर्मि Light] उस प्रकार (दुष्टरा:) = कठिनता से अभिभूत करने योग्य हैं (न) = जैसे (प्रवणे) = निम्न प्रदेश में (ऊर्मयः) = तरंगें । झुकाव की ओर गतिवाली तरंगों का वेग जैसे दुस्तर होता है, इसी प्रकार प्रभु के प्रकाश को भी कोई अभिभूत नहीं कर सकता। ये प्रभु हमें बुद्धि के साथ बल को प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमारे पुण्य-पाप को जानते हुए हमें कर्मानुसार वसुओं को प्राप्त कराते हैं। प्रभु के प्रकाश अभिभूत करने योग्य नहीं। प्रभु ही हमें बुद्धि व बल प्राप्त करायेंगे।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Adore and exalt Agni, worthy of worship, who knows, gives and circulates wealth of the world whether open and developed or hidden and potential. Anxious as he is to give wealth and victory by thought and action, his generosity is difficult to surpass, like waves of the sea in flood.