गातु वित्तमः, आर्यस्य वर्धनः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] वह (अग्नि) = अग्रेणी प्रभु (गातुवित्तमः) = अतिशयेन मार्ग का ज्ञाता अदर्शि हमारे हृदयों में प्रादुर्भूत होता है। (यस्मिन्) = जिस प्रभु में स्थित हुए हुए ये आराधक (व्रतानि) = अपने कर्त्तव्य कर्मों को (आदधुः) = धारण करते हैं। हृदयस्थ प्रभु मार्ग का दर्शन कराते हैं, और आराधक उस मार्ग पर आगे बढ़ता है। । [२] उस (सुजातम्) = हृदयों में सम्यक् प्रादुर्भूत (आर्यस्य वर्धनम्) = आर्यों के कर्त्तव्य कर्मों का आचरण करनेवालों के (वर्धनम्) = बढ़ानेवाले (अग्निम्) = अग्रेणी प्रभु को (नः) = हमारी (गिरः) = स्तुतिवाणियाँ (उपोनक्षन्त) = प्राप्त हों ही । हम अवश्य प्रभु का स्तवन करनेवाले बनें। यह प्रभु- स्तवन ही हमें मार्गदर्शन करायेगा, मार्ग पर बढ़ने की शक्ति देगा और उत्तम कर्मों को करते हुए हम वृद्धि को प्राप्त करेंगे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु मार्गदर्शक हैं, मार्ग पर बढ़ने की शक्ति देते हैं, मार्ग पर चलनेवालों का वर्धन करते हैं। सो प्रभु को हमारी स्तुतिवाणियाँ प्राप्त हों।