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आ स॒वं स॑वि॒तुर्य॑था॒ भग॑स्येव भु॒जिं हु॑वे । अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ā savaṁ savitur yathā bhagasyeva bhujiṁ huve | agniṁ samudravāsasam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । स॒वम् । स॒वि॒तुः । य॒था॒ । भग॑स्यऽइव । भु॒जिम् । हु॒वे॒ । अ॒ग्निम् । स॒मु॒द्रऽवा॑ससम् ॥ ८.१०२.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:10» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:6


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सवितुः सवं, भगस्य भुजिम्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जैसे (सवितुः) = उस प्रेरक प्रभु की (सवम्) = प्रेरणा को (आहुवे) = पुकारता हूँ, अर्थात् जैसे मैं चाहता हूँ कि प्रभु की प्रेरणा को सुन पाऊँ । (इव) = जैसे (भगस्य) = उस ऐश्वर्यशाली प्रभु की (भुजिम्) = पालन की साधनभूत सम्पत्ति को [आहुवे ] पुकारता हूँ, अर्थात् पालन के लिये आवश्यक धन की कामना करता हूँ। [२] उसी प्रकार मैं (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को पुकारता हूँ जो (समुद्रवाससम्) = सदा आनन्दमय हैं और सबको आच्छादित करनेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम उस प्रेरक प्रभु की प्रेरणा को सुनें । ऐश्वर्य पुञ्ज प्रभु से पालन के लिये आवश्यक ऐश्वर्य को प्राप्त करें। निरन्तर आगे बढ़ते हुए आनन्दमय प्रभु की गोद में पहुँचकर विश्राम लें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Like the creative power of the sun and the inspiring lord creator, and like the pleasurable gifts of the lord of power, honour and excellence, I invoke and study the passion and fire hidden in the sea and sky and in the cave of the heart.