देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
औ॒र्व॒भृ॒गु॒वच्छुचि॑मप्नवान॒वदा हु॑वे । अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
aurvabhṛguvac chucim apnavānavad ā huve | agniṁ samudravāsasam ||
पद पाठ
औ॒र्व॒भृ॒गु॒ऽवत् । शुचि॑म् । अ॒प्न॒वा॒न॒ऽवत् । आ । हु॒वे॒ । अ॒ग्निम् । स॒मु॒द्रऽवा॑ससम् ॥ ८.१०२.४
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:4
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:9» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:4
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
और्व भृगु अप्नवान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (और्व) [वत्] = और्व की तरह [उरोरपत्यम्] विशाल की सन्तान की तरह, अत्यन्त विशाल हृदय बनकर (शुचिम्) = पवित्र प्रभु को (आहुवे) = पुकारता हूँ। वस्तुतः विशालता ही हमारे जीवन को पवित्र बनाती है। जितने जितने विशाल बनेंगे, उतना उतना ही पवित्र बन पायेंगे तभी हमें 'शुचि' प्रभु को पुकारने का अधिकार होगा। [२] (भृगुवत्) = [भ्रस्ज पाके] तपस्या की अग्नि में अपने को परिपक्व करनेवाले की तरह मैं (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को [आहुवे] पुकारता हूँ। तपस्वी बनकर मैं भी अग्नि बनता हूँ, निरन्तर आगे बढ़नेवाला बनता हूँ। तप ही उन्नति का साधन है। [३] (अप्नवानवत्) = [ अप: कर्मनाम - Weaving ताना-बाना] कर्मों के ताने-बानेवाले, निरन्तर कर्मशील पुरुष की तरह (समुद्रवाससम्) = उस आनन्दमय सब के आच्छादक प्रभु को पुकारता हूँ। कर्मों में लगे रहने से मेरा जीवन भी आनन्दमय बनता है और मैं प्रभु को अपना वस्त्र बनाकर बड़े सुरक्षित जीवनवाला होता हूँ। मेरे कर्म पवित्र बने रहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम विशाल हृदय बनें यही पवित्रता का मार्ग है। हम तपस्वी बनें, यही उन्नति का साधन है। हम निरन्तर क्रियाशील हों, तभी आनन्दमय प्रभु की गोद को पाने के अधिकारी होंगे।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Like a mature and self-disciplined sage and scholar of nature and spirit, I invoke and study Agni, the fire energy, concealed in the sea and the sky and the psychic energy abiding in the mind.
