देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
अ॒ग्निमिन्धा॑नो॒ मन॑सा॒ धियं॑ सचेत॒ मर्त्य॑: । अ॒ग्निमी॑धे वि॒वस्व॑भिः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
agnim indhāno manasā dhiyaṁ saceta martyaḥ | agnim īdhe vivasvabhiḥ ||
पद पाठ
अ॒ग्निम् । इन्धा॑नः । मन॑सा । धिय॑म् । स॒चे॒त॒ । मर्त्यः॑ । अ॒ग्निम् । ई॒धे॒ । वि॒वस्व॑ऽभिः ॥ ८.१०२.२२
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:22
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:7
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:22
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उपासना - बुद्धि- पवित्रता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मर्त्यः) = सामान्यतः विषयों की ओर जानेवाला [विषयों के पीछे मरनेवाला] मनुष्य, विषयासक्ति को छोड़ने के उद्देश्य से, (मनसा) = मन से मनन व चिन्तन के द्वारा (अग्निम्) = उस अग्रेणी प्रभु को (इन्दायः) = अपने अन्दर समिद्ध करता हुआ (धियं सचेत) = बुद्धि को प्राप्त करे, बुद्धि का अपने साथ समवाय करे। यह बुद्धि ही उसे विषयासक्ति से मुक्त करेगी । 'उपासना से बुद्धि व बुद्धि से विषयासक्ति का निराकरण' यह क्रम है। एवं उपासना हमारे जीवनों को पवित्र कर डालती है। [२] मैं (विवस्वभिः) = विद्वान् पुरुषों के सम्पर्क से (अग्निम् ईधे) = उस प्रभु को ही अपने हृदय में समिद्ध करता हूँ। ज्ञानियों का सम्पर्क हमें भी ज्ञानी बनाता है। तब हम प्रभु की ओर झुकते हैं और सब विषय-वासनाओं से मुक्त हो जाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-हम कितने भी गिर जायें, उपासना से हमें बुद्धि प्राप्त होगी और हम फिर उत्त्थान को प्राप्त करेंगे। सो ज्ञानियों के सम्पर्क से हम प्रभु को अपने अन्दर दीप्त करें। अब यह व्यक्ति अपना उत्थान करनेवाला व उत्तम भरण करनेवाला 'सोभरि' बनता है। समझदार हो जाने से अब यह 'काण्व' है । यह अग्नि का आराधन करता हुआ कहता है-
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - When the mortal starts lighting the fire in the vedi, let him, with his whole mind in concentration, call up all his faculties of perception, thought and action and say: I light the fire with all my light, will and awareness and awaken the divine in the soul.
