देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
यदत्त्यु॑प॒जिह्वि॑का॒ यद्व॒म्रो अ॑ति॒सर्प॑ति । सर्वं॒ तद॑स्तु ते घृ॒तम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yad atty upajihvikā yad vamro atisarpati | sarvaṁ tad astu te ghṛtam ||
पद पाठ
यत् । अत्ति॑ । उ॒प॒ऽजिह्वि॑का । यत् । व॒म्रः । अ॒ति॒ऽसर्प॑ति । सर्व॑म् । तत् । अ॒स्तु॒ । ते॒ । घृ॒तम् ॥ ८.१०२.२१
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:21
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:6
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:21
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उपासना से विषयासक्ति का निराकरण
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्) = जिस को (उपजिह्विका) = जीभ की चञ्चल प्रकृति-चटोरापन (अति) = खा जाता है। अथवा (यत्) = जो (वम्रः) = सब पढ़े-लिखे का वमन कर डालनेवाला होकर (अति र्स्पति) - ज्ञानदीप्त हो उठे। [२] प्रभु की उपासना सब विषयासक्तियों को दूर कर देती है। उपासना से जीभ का चटोरापन दूर हो जाता है और ज्ञान की रुचि उत्पन्न हो जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमें जीभ का चटोरापन खा जाता है। ज्ञान में अरुचिवाले होकर हम अवारा से हो जाते हैं। उपासना सब विषयों को दूर करके हमें ज्ञानदीप्त बना देती है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Whatever your flames of fire consume, whatever the fumes spread over, let all that be food for your dynamics of existence in evolution.
