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न॒हि मे॒ अस्त्यघ्न्या॒ न स्वधि॑ति॒र्वन॑न्वति । अथै॑ता॒दृग्भ॑रामि ते ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

nahi me asty aghnyā na svadhitir vananvati | athaitādṛg bharāmi te ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

न॒हि । मे॒ । अस्ति॑ । अघ्न्या॑ । न । स्वऽधि॑तिः । वन॑न्ऽवति । अथ॑ । ए॒ता॒दृक् । भ॒रा॒मि॒ । ते॒ ॥ ८.१०२.१९

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:19 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:19


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

न अघ्न्या, न स्वधिति:

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो ! (मे) = मेरे पास (अघ्न्या) = यह अहन्तव्य वेद- धेनु (नहि अस्ति) = नहीं है। अर्थात् मैंने कोई बड़ा [वेद] ज्ञान नहीं प्राप्त किया है। (स्वधितिः) = आत्मधारण शक्ति (न वनन्वति) = मेरे दोषों का संहार नहीं करती। आत्मधारण के द्वारा मैं जीवन को निर्दोष भी नहीं बना पाया। न तो मैं ज्ञानी हूँ, और ना ही निर्दोष। [२] अथ अब (एतादृग्) = ऐसा अज्ञानी व सदोष होता हुआ भी (ते भरामि) = आपके लिये स्तुति वचनों का भरण करता हूँ। आपका स्तवन ही मुझे दीप्त ज्ञानाग्निवाला बनाकर दोषों को भस्म करने की क्षमता प्रदान करेगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-एक अज्ञानी व आत्मधारणशक्ति से रहित पुरुष भी जब प्रभु का स्तवन करता है, तो प्रभु उसकी ज्ञानाग्नि को दीप्त करके उसमें उसके दोषों को भस्म कर देते हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I have neither total immunity nor any essential power of my own, neither milk nor ghrta, nor even the fire fuel to offer. Hence I adore and worship you the way I can, offer you myself for the service I am worth.