देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: पादनिचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
प्रचे॑तसं त्वा क॒वेऽग्ने॑ दू॒तं वरे॑ण्यम् । ह॒व्य॒वाहं॒ नि षे॑दिरे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
pracetasaṁ tvā kave gne dūtaṁ vareṇyam | havyavāhaṁ ni ṣedire ||
पद पाठ
प्रऽचे॑तसम् । त्वा॒ । क॒वे॒ । अग्ने॑ । दू॒तम् । वरे॑ण्यम् । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् । नि । से॒दि॒रे॒ ॥ ८.१०२.१८
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:18
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:18
379 बार पढ़ा गया
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उपासना का फल
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (कवे) = क्रान्तदर्शिन् सर्वज्ञ (अग्ने) = अग्रेणी प्रभो ! (प्रचेतसम्) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले, प्रकृष्ट चेतना को प्राप्त करानेवाले, (त्वा) = आपको (निषेदिरे) = देव लोग उपासित करते हैं, आपके चरणों में बैठते हैं। [२] उन आपको देव उपासित करते हैं, जो (दूतम्) = ज्ञान के सन्देश को प्राप्त करानेवाले हैं। अतएव (वरेण्यम्) = वरणीय हैं। प्रभु के वरण में ही कल्याण है। प्रकृति का वरण हमें पीस डालता है। प्रभु का वरण होने पर प्रकृति हमारी सेवा करती है। (हव्यवाहम्) = वस्तुतः प्रभु ही सब हव्य पदार्थों को प्राप्त करानेवाले हैं।
भावार्थभाषाः - ज्ञान भावार्थ- प्रभु के चरणों में बैठनेवाला व्यक्ति [क] प्रकृष्ट चेतना को प्राप्त करता है, सन्देश को सुनता है, [ग] प्रकृति से सेवित होता है, [घ] सब हव्य पदार्थों को प्राप्त करता है।
379 बार पढ़ा गया
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - O wise and visionary, poetic maker, Agni, divinities of nature and humanity, wise sages, have honoured and established you as wide awake, all present carrier and harbinger of yajnic materials of existence, catalyser of evolutionary development and the power worthy of choice for living the good life.
