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अग्ने॑ घृ॒तस्य॑ धी॒तिभि॑स्तेपा॒नो दे॑व शो॒चिषा॑ । आ दे॒वान्व॑क्षि॒ यक्षि॑ च ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne ghṛtasya dhītibhis tepāno deva śociṣā | ā devān vakṣi yakṣi ca ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑ । घृ॒तस्य॑ । धी॒तिऽभिः॑ । ते॒पा॒नः । दे॒व॒ । शो॒चिषा॑ । आ । दे॒वान् । व॒क्षि॒ । यक्षि॑ । च॒ ॥ ८.१०२.१६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:16 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:12» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:16


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

घृतस्य धीतिभिः - शोचिषा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रेणी देव हमारे जीवनों को ज्ञान से द्योतित करनेवाले प्रभो ! [देवो द्योतनात्] (घृतस्य) = ज्ञानदीप्तियों के (धीतिभिः) = धारणों से विविध विज्ञानों को प्राप्त कराने के द्वारा तथा (शोचिषा) = अन्त: प्रकाश के द्वारा, पूर्ण निर्मल हृदय की दीप्ति के द्वारा [चमक के द्वारा ] (तेपान:) = हमारे जीवनों को दीप्त करते हुए आप (देवान् आवक्षि) = हमारे जीवनों में दिव्य गुणों को प्राप्त कराइये (च) = और (यक्षि) = उनके साथ ही हमारा सम्बन्ध करिये।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु हमें विज्ञानों के धारण व अन्त: प्रकाश से दीप्त जीवनवाला बनाते हुए दिव्य गुणों को प्राप्त करायें, दिव्य गुणों से ही हमारा सम्बन्ध करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, light of life, brilliant and generous divinity, burning and shining by the flames of fire fed on ghrta, O enlightened scholars and divines, shining by the light of knowledge fed by your own awareness, bring in the divinities of nature and humanity to the vedi and carry on the yajna.