देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
प॒दं दे॒वस्य॑ मी॒ळ्हुषोऽना॑धृष्टाभिरू॒तिभि॑: । भ॒द्रा सूर्य॑ इवोप॒दृक् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
padaṁ devasya mīḻhuṣo nādhṛṣṭābhir ūtibhiḥ | bhadrā sūrya ivopadṛk ||
पद पाठ
प॒दम् । दे॒वस्य॑ । मी॒ळ्हुषः॑ । अना॑धृष्टाभिः । ऊ॒तिऽभिः॑ । भ॒द्रा । सूर्यः॑ऽइव । उ॒प॒ऽदृक् ॥ ८.१०२.१५
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:15
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:11» मन्त्र:5
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:15
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
शत्रुओं से अधर्षण व अन्धकार विनाश
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मीढुषः) = सब सुखों का सेचन करनेवाले (देवस्य) = प्रकाशमय प्रभु का (पदम्) = स्थान (अनाधृष्टाभिः) = शत्रुओं से अधर्षणीय (ऊतिभिः) = रक्षणों से युक्त है। जब हम प्रभु का स्मरण करते हैं, तो कोई भी वासनात्मक शत्रु हमारा धर्षण नहीं कर पाता। [२] इस प्रभु की (उपदृक्) = उपदृष्टि (सूर्य: इव) = सूर्य के समान है, सूर्य की तरह सब अन्धकार को दूर करनेवाली है और (भद्रा) = कल्याणकर है। जब हम प्रभु के समीप उपस्थित होते हैं और प्रभु की कृपादृष्टि को प्राप्त करते हैं, तो हमारा सब अन्धकार विनष्ट हो जाता है और हम वास्तविक कल्याण को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु में स्थित होने का प्रयत्न करें, उस समय कोई भी शत्रु हमारा धर्षण न कर पायेगा। प्रभु की कृपादृष्टि हमारे सब अन्धकार को दूर कर देगी। उस समय हमारा कल्याण ही कल्याण होगा।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The seat of the refulgent, generous and virile divinity, Agni, with undaunted powers of protection is auspicious and blissful, shining like an inner sun and the second inner eye with inward light and vision.
