देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: निचृद्गायत्री
स्वर: षड्जः
यस्य॑ त्रि॒धात्ववृ॑तं ब॒र्हिस्त॒स्थावसं॑दिनम् । आप॑श्चि॒न्नि द॑धा प॒दम् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yasya tridhātv avṛtam barhis tasthāv asaṁdinam | āpaś cin ni dadhā padam ||
पद पाठ
यस्य॑ । त्रि॒ऽधातु॑ । अवृ॑तम् । ब॒र्हिः । त॒स्थौ । अस॑म्ऽदिनम् । आपः॑ । चि॒त् । नि । द॒ध॒ । प॒दम् ॥ ८.१०२.१४
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:14
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:11» मन्त्र:4
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:14
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
उपासना से हृदय की पवित्रता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यस्य) = जिस प्रभु का (बर्हिः) = यह हृदयरूप आसन (त्रिधातु) = 'ज्ञान, कर्म, उपासना' तीनों का धारण करनेवाला होता हुआ (तस्थै) = स्थित होता है। जब हम हृदय को प्रभु का आसन बनाते हैं, तो यह ज्ञान, कर्म व उपासना तीनों का धारण करनेवाला होता है। (अवृतम्) = यह काम-क्रोध से संवृत नहीं होता, इस पर काम आदि का आवरण नहीं पड़ जाता। (असन्दिनम्) = यह विषय वासनाओं से बद्ध नहीं होता। [२] हृदय को प्रभु का आसन बनाने पर वासनाओं के विनाश के कारण (आपः चित्) = ये रेतःकणरूप जल भी (पदं निदधा) = शरीर में स्थिति को प्राप्त करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हृदय में प्रभु का ध्यान करने पर हृदय [क] ज्ञान, कर्म, उपासना का धारण करनेवाला बनता है, [ख] काम आदि से संवृत नहीं होता, [ग] विषयों से अबद्ध रहता है। उस समय शरीर में उत्पन्न रेतःकणों की शरीर में ही स्थिति होती है।
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - The three-quality mind of the celebrant with sattva, rajas and tamas, open and unfettered, is the seat of Agni where peace and potential for action both have their seat.
