देवता: अग्निः
ऋषि: प्रयोगो भार्गव अग्निर्वा पावको बार्हस्पत्यः ; अथवाग्नी गृहपतियविष्ठौ सहसः सुतौ तयोर्वान्यतरः
छन्द: गायत्री
स्वर: षड्जः
उप॑ त्वा जा॒मयो॒ गिरो॒ देदि॑शतीर्हवि॒ष्कृत॑: । वा॒योरनी॑के अस्थिरन् ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
upa tvā jāmayo giro dediśatīr haviṣkṛtaḥ | vāyor anīke asthiran ||
पद पाठ
उप॑ । त्वा॒ । जा॒मयः॑ । गिरः॑ । देदि॑शतीः । ह॒विः॒ऽकृतः॑ । वा॒योः । अनी॑के । अ॒स्थि॒र॒न् ॥ ८.१०२.१३
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:13
| अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:11» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:13
329 बार पढ़ा गया
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
स्तुति से सद्गुणों व बल की प्राप्ति
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे अग्ने ! (हविष्कृतः) - इस यज्ञशील पुरुष की, इससे की जानेवाली (त्वा देदिशतः) = आपका संकेत करती हुई, आपके गुणों का प्रतिपादन करती हुई (गिरः) = स्तुतिवाणियाँ (उप) [ तिष्ठन्ते ] = आपके समीप उपस्थित होती हैं। ये स्तुतिवाणियाँ (जामयः) = सद्गुणों को जन्म देनेवाली होती हैं। इन स्तुतिवाणियों से स्तोता के हृदय में भी उस उस गुण को धारण करने की प्रेरणा उत्पन्न होती है। [२] ये स्तुतिवाणियाँ स्तोता को (वायोः) = वायु के (अनीके) = बल में (अस्थिरन्) = स्थापित करती हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-प्रभु-स्तवन से स्तोता के जीवन में सद्गुणों का स्थापन होता है और ये स्तुतिवाणियाँ स्तोता को वायु के समान शक्ति सम्पन्न करती हैं।
329 बार पढ़ा गया
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Moving and vibrant adorations of the enlightened celebrant reach you and stay by you in the movements of air in the middle regions.
