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शी॒रं पा॑व॒कशो॑चिषं॒ ज्येष्ठो॒ यो दमे॒ष्वा । दी॒दाय॑ दीर्घ॒श्रुत्त॑मः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

śīram pāvakaśociṣaṁ jyeṣṭho yo dameṣv ā | dīdāya dīrghaśruttamaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

शी॒रम् । पा॒व॒कऽशो॑चिषम् । ज्येष्ठः॑ । यः । दमे॑षु । आ । दी॒दाय॑ । दी॒र्घ॒श्रुत्ऽत॑मः ॥ ८.१०२.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:102» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:11


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ज्येष्ठः-दीर्घश्रुत्तमः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यः) = जो (दीर्घश्रुत्तमः) = अतिशयेन विद्वान् सर्वज्ञ (ज्येष्ठः) = सर्वश्रेष्ठ प्रभु हैं वे (दमेषु) = यज्ञशील पुरुषों के गृहों में (आदीदाय) = दीप्त होते हैं। [२] उन (शीरम्) = सर्वत्र अनुशायी [व्यापक] (पावकशोचिषम्) = पवित्र दीप्तिवाले प्रभु को स्तुत करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु सर्वज्ञ, सर्वश्रेष्ठ हैं, यज्ञशील पुरुषों के गृहों में दीप्त होते हैं। उन सर्वव्यापक पवित्र दीप्तिवाले प्रभु का हम स्तवन करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Adore Agni, omnipresent, pure, fiery and purifying. Agni is the highest divine, most famous, and shines in us and illuminates our homes.