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प्र मि॒त्राय॒ प्रार्य॒म्णे स॑च॒थ्य॑मृतावसो । व॒रू॒थ्यं१॒॑ वरु॑णे॒ छन्द्यं॒ वच॑: स्तो॒त्रं राज॑सु गायत ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra mitrāya prāryamṇe sacathyam ṛtāvaso | varūthyaṁ varuṇe chandyaṁ vacaḥ stotraṁ rājasu gāyata ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । मि॒त्राय॑ । प्र । अ॒र्य॒म्णे । स॒च॒थ्य॑म् । ऋ॒त॒व॒सो॒ इत्यृ॑तऽवसो । व॒रू॒थ्य॑म् । वरु॑णे । छन्द्य॑म् । वचः॑ । स्तो॒त्रम् । राज॑ऽसु । गा॒य॒त॒ ॥ ८.१०१.५

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:101» मन्त्र:5 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:6» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:5


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मित्र, अर्यमा व वरुण' का स्तवन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (ऋतावसो) = ऋतरूपी वसुवाले, यज्ञ को ही अपना धन बनानेवाले, उपासक (मित्राय) = स्नेह की देवता के लिये (सचथ्यम्) = मेल में उत्तम, सम्यक् मेल के करानेवाले (वचः) = वचन का (प्र) [गाय]= यत्न कर। (अर्यम्णे) = [ अरीन् यच्छति] शत्रुओं का नियमन करनेवाले अर्यमा के लिये (वरूथ्यम्) = उत्तम कवच काम करनेवाले वचन का प्र [गाय] गायन कर। इसी प्रकार (वरुणे) = वरुण के विषय में, द्वेष निवारण के पवित्र भाव के विषय में, (छन्द्यं वचः) = छादन में, उत्तम रक्षण में उत्तम वचन को बोल । मित्र, अर्यमा व वरुण की आराधना करता तू 'मित्र, अर्यमा और वरुण' ही बन । [२] (राजसु) = जीवन को दीप्त बनानेवाले इन 'मित्र, अर्यमा व वरुण' के विषय में (स्तोत्रम्) = स्तोत्र का (गायत) = गायन करो। इनका स्तवन करते हुए 'स्नेह, संयम व निर्दोषता' को धारण करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम काम-क्रोध-लोभ के आक्रमण से बचकर स्नेह व निर्देषता का भाव धारण करते हुए प्रभु विषयक प्रश्नों को करें, प्रभु को पुकारें, प्रभु विषयक संवादों को करें । निरन्तर कर्त्तव्य कर्मों में लगे रहने के द्वारा हम इन शत्रुओं के आक्रमण से अपने को बचानेवाले हों।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O lover of truth and eternal laws and values of cosmic truth, sing together, sing in the home and sing on joyous occasions collective, homely and celebrative songs in honour of Mitra, lord of love and universal friendship, Aryaman, lord of the paths of rectitude, and Varuna, lord of judgement and wisdom. Sing hymns of adoration for all the refulgent divinities.