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इ॒यं या नीच्य॒र्किणी॑ रू॒पा रोहि॑ण्या कृ॒ता । चि॒त्रेव॒ प्रत्य॑दर्श्याय॒त्य१॒॑न्तर्द॒शसु॑ बा॒हुषु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

iyaṁ yā nīcy arkiṇī rūpā rohiṇyā kṛtā | citreva praty adarśy āyaty antar daśasu bāhuṣu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इ॒यम् । या । नीची॑ । अ॒र्किणी॑ । रू॒पा । रोहि॑ण्या । कृ॒ता । चि॒त्राऽइ॑व । प्रति॑ । अ॒द॒र्शि॒ । आ॒ऽय॒ती । अ॒न्तः । द॒शऽसु॑ । बा॒हुषु॑ ॥ ८.१०१.१३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:101» मन्त्र:13 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:8» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:13


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सूर्यप्रभा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] सूर्य की किरणें द्युलोक से नीचे पृथिवीलोक पर आती हैं। सो (इयम्) = यह या जो सूर्यप्रभा (नीची) = अवाङ्मुखी, नीचे मुख किये हुए-सी है। (अर्किणी) = स्तुतिवाली है। इसके होने पर सब देव प्रभु-स्तवन में प्रवृत्त होते हैं। यह (रूपा) = उत्तम रूपवाली (रोहिण्या) = प्रकाशयुक्त (कृता) = की गई है। [२] (चित्रा इव) = अत्यन्त अद्भुत-सी यह (दशसु) = दसों (बाहुषु अन्तः) = ब्रह्माण्ड की बाहु - स्थानीय दिशाओं के अन्दर (आयती) = आती हुई (प्रत्यदर्शि) = प्रतिदिन देखी जाती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - इस अद्भुत-सी सूर्यप्रभा में उस महान् सूर्य प्रभु की महिमा दिखती है। सूर्य को भी तो वे प्रभु ही दीप्ति दे रहे हैं।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - This light of the dawn coming down, from the horizon, beautiful, created by the golden red rays of the sun, radiating over the earth below like the arms of divinity in the ten directions of space, looks like a wonder gift of divinity.