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वेत्य॑ध्व॒र्युः प॒थिभी॒ रजि॑ष्ठै॒: प्रति॑ ह॒व्यानि॑ वी॒तये॑ । अधा॑ नियुत्व उ॒भय॑स्य नः पिब॒ शुचिं॒ सोमं॒ गवा॑शिरम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vety adhvaryuḥ pathibhī rajiṣṭhaiḥ prati havyāni vītaye | adhā niyutva ubhayasya naḥ piba śuciṁ somaṁ gavāśiram ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वेति॑ । अ॒ध्व॒र्युः । प॒थिऽभिः॑ । रजि॑ष्ठैः । प्रति॑ । ह॒व्यानि॑ । वी॒तये॑ । अध॑ । नि॒यु॒त्वः॒ । उ॒भ्य॑स्य । नः॒ । पि॒ब॒ । शुचि॑म् । सोम॑म् । गोऽआ॑शिरम् ॥ ८.१०१.१०

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:101» मन्त्र:10 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:7» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:10


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अध्वर्यु का ऋजुतम मार्गों से गमन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अध्वर्युः) = यज्ञशील पुरुष (रजिष्ठैः पथिभिः) = ऋजुतम, सरल, छलछिद्रशून्य मार्गों से (वेति) = जाता है [गच्छति ] । यह (हव्यानि) = हव्य पदार्थों के सात्त्विक भोजनों के ही (प्रति वीतये) = प्रतिदिन भक्षण के लिये होता है। सात्त्विक भोजन से सात्त्विक बुद्धिवाला होकर, यह कुटिलता से कभी कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। [२] हे (नियुत्वः) = कर्त्तव्यों में लगे हुए प्रशस्त इन्द्रियाश्वोंवाले जीव ! (नः) = हमारे (उभयस्य) = अभ्युदय व निःश्रेयस के साधक अथवा ज्ञान व बल दोनों के साधक (सोमं पिब) = सोम का तू शरीर में ही रक्षण कर। यह सोम (शुचिम्) = जीवन को पवित्र बनानेवाला है। (गवाशिरम्) = [गो-शृ] ज्ञान की वाणियों द्वारा सब मलिनताओं का संहार करनेवाला है। शरीर में सुरक्षित सोम मन को पवित्र व बुद्धि को दीप्त बनाता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम यज्ञशील बनकर सरल मार्गों से चलें, सात्त्विक भोजनों का सेवन करें। क्रियाशील बनकर सोम का रक्षण करें। सुरक्षित सोम पवित्रता व ज्ञानवृद्धि का साधन बनता है।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The high priest of yajna unhurting life, moving with love, goes forward by the simplest and most truthful ways of holy working with yajnic materials to create the fragrances of life. Then you, master of yajnic creations, taste and enjoy the soma of our creations both in pure form and as seasoned and strengthened with practical applications for the good of life.