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ऋध॑गि॒त्था स मर्त्य॑: शश॒मे दे॒वता॑तये । यो नू॒नं मि॒त्रावरु॑णाव॒भिष्ट॑य आच॒क्रे ह॒व्यदा॑तये ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛdhag itthā sa martyaḥ śaśame devatātaye | yo nūnam mitrāvaruṇāv abhiṣṭaya ācakre havyadātaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋध॑क् । इ॒त्था । सः । मर्त्यः॑ । श॒श॒मे । दे॒वऽता॑तये । यः । नू॒नम् । मि॒त्रावरु॑णौ । अ॒भिष्ट॑ये । आ॒ऽच॒क्रे । ह॒व्यऽदा॑तये ॥ ८.१०१.१

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:101» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:6» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:1


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवतातये-अभिष्टये हव्यदातये

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋधक्) = विशेषकर (इत्था) = सचमुच वह पुरुष (शशमे) = शमवाला, शान्तिवाला बनता है, जो (देवतातये) = दिव्य गुणों के विस्तार के लिये यत्नशील होता है। [२] (यः) = जो (नूनम्) = निश्चय से (मित्रावरुणौ) = स्नेह व निर्देषता [द्वेष निवारण] के भावों को (आचक्रे) = अपने अन्दर उत्पन्न करता है, वह (अभिष्टये) = रोगों व वासनाओं पर आक्रमण के लिये होता है, और (हव्यदातये) = हव्य के देने के लिये होता है, अर्थात् यज्ञ करता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम शम की साधना करके दिव्य गुणों का विस्तार करें। स्नेह व निर्देषता को धारण करते हुए वासनाओं पर आक्रमण करें और यज्ञशील बनें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Truly does that person find peace of mind for the attainment of divine love and favour who thus wins the balance of Mitra and Varuna, i.e., prana and udana energies for physical, mental and spiritual good for the service of divinity.