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प्र नू॒नं धा॑वता॒ पृथ॒ङ्नेह यो वो॒ अवा॑वरीत् । नि षीं॑ वृ॒त्रस्य॒ मर्म॑णि॒ वज्र॒मिन्द्रो॑ अपीपतत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra nūnaṁ dhāvatā pṛthaṅ neha yo vo avāvarīt | ni ṣīṁ vṛtrasya marmaṇi vajram indro apīpatat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । नू॒नम् । धा॒व॒त॒ । पृथ॑क् । न । इ॒ह । यः । वः॒ । अवा॑वरीत् । नि । सी॒म् । वृ॒त्रस्य॑ । मर्म॑णि । वज्र॑म् । इन्द्रः॑ । अ॒पी॒प॒त॒त् ॥ ८.१००.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:100» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:5» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:7


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वृत्र के मर्म पर वज्र प्रहार

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नूनम्) = निश्चय से जो वृत्र [काम] नामक शत्रु (प्रधावता) = तुम्हारी ओर प्रकर्षेण दौड़ता है । (यः) = जो (इह) = इस जीवन में (पृथङ् न) = तुम्हारे से पृथक् नहीं होता है, अपितु (वः) = तुम्हें (अवावरीत्) = आवृत किये रहता है, तुम्हारे पर परदे के रूप में पड़ा रहता है। उस (वृत्रस्य) = ज्ञान की आवरणभूत काम-वासना के (मर्मणि) = मर्मस्थल पर (इन्द्रः) = वह परमैश्वर्यशाली प्रभु (वज्रम्) = वज्र को (सीम्) = निश्चय से (नि अपीपतत्) = गिराता है, वज्र द्वारा उसका विनाश कर देता है। [२] काम- वासना हमारे पर निरन्तर आक्रमण करती है, हमें यह घेरे रहती है। प्रभु की कृपा से ही हम क्रियाशीलता द्वारा इस पर विजय पाने में समर्थ होते हैं। क्रियाशीलता ही वज्र है, जो इसका विनाश करती है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु स्मरण के साथ सतत क्रियाशील बनकर हम वासना को विनष्ट करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O friends of divinity, with determined will and decision, move forward and run fast, each in your own style, there is none to stop you. Indra, lord omnipotent, strikes the thunderbolt at the core of darkness and destroys the obstructions.