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ययो॒रधि॒ प्र य॒ज्ञा अ॑सू॒रे सन्ति॑ सू॒रय॑: । ता य॒ज्ञस्या॑ध्व॒रस्य॒ प्रचे॑तसा स्व॒धाभि॒र्या पिब॑तः सो॒म्यं मधु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yayor adhi pra yajñā asūre santi sūrayaḥ | tā yajñasyādhvarasya pracetasā svadhābhir yā pibataḥ somyam madhu ||

पद पाठ

ययोः॑ । अधि॑ । प्र । य॒ज्ञाः । अ॒सू॒रे । सन्ति॑ । सू॒रयः॑ । ता । य॒ज्ञस्य॑ । अ॒ध्व॒रस्य॑ । प्रऽचे॑तसा । स्व॒धाभिः॑ । या । पिब॑तः । सो॒म्यम् । मधु॑ ॥ ८.१०.४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:10» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:8» वर्ग:34» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:2» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

फिर भी राजकर्तव्य कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यों ! (ययोः) जिन पुण्यकृत राजा और अमात्य के (अधि) ऊपर (यज्ञाः) सब ही शुभकर्म (प्रभवन्ति) आश्रित हैं जिनके (सूरयः) विद्वान् जन (असूरे) सूर्य्योदय के पूर्व ही उठकर अपने कृत्य में लगते हैं, यद्वा जिनके (असूरे) सूर्य्यरहित उत्तरीय ध्रुवादि प्रदेश में भी (सूरयः) विद्वान् जन प्रजा हैं और जो (ता) वे ही (अध्वरस्य) हिंसा पापरहित (यज्ञस्य) शुभकर्म के (प्रचेतसा) अच्छे प्रकार ज्ञाता हैं, वे ही (स्वधाभिः) स्वरक्षिका प्रजाओं के साथ (सोम्यम्+मधु) सोमयुक्त मधु को (पिबतः) पीते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो राजा कर्मचारियों के साथ शुभकर्मों की रक्षा करते, जिनकी प्रजाएँ प्रातःकाल ही उठकर अपने-२ कार्य्य में लग जाते, जो यज्ञतत्त्वों को जानते, वे ही राजा प्रजा के मध्य माननीय होते हैं ॥४॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ययोः) जिनके (यज्ञाः, प्र, अधि) यज्ञ अधिक प्रवृत्त होते हैं (असूरे) विद्यारहित देश में (सूरयः, सन्ति) जिनके विद्वान् बसते हैं (अध्वरस्य, यज्ञस्य, प्रचेतसा) हिंसारहित यज्ञों के जाननेवाले (ता) वे दोनों (स्वधाभिः) स्तुति द्वारा आवें (या) जो (सोम्यम्, मधु, पिबतः) सोम के मधुर रस को पीते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - हे सभाध्यक्ष तथा सेनाध्यक्ष ! विद्यारहित प्रदेशों में विद्याप्रचार का सुप्रबन्ध उन देशों में वास करनेवाले विद्वानों द्वारा करावें और हिंसारहित यज्ञों में सहायक होकर उनको पूर्ण करें ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'यज्ञ स्तवन सोमरक्षण व आत्मधारण शक्ति'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] वे प्राणापान (ययोः अधि) = जिन में (यज्ञाः) = यज्ञ (प्र सन्ति) = प्रकर्षेण निवास करते हैं जिनकी साधना के होने पर (असूरे) = स्तोतृरहित स्थान में भी (सूरयः) = स्तोता लोग (सन्ति) = हो जाते हैं। अर्थात् ये प्राणापान हमें यज्ञों में प्रवृत्त करते हैं और इनकी साधना के द्वारा हमारे में स्तुति की वृत्ति उत्पन्न होती है। [२] (ता) = वे प्राणापान (अध्वरस्य यज्ञस्य) = हिंसारहित यज्ञों के (प्रचेतसा) = प्रकर्षेण चेतानेवाले होते हैं। (यः) = जो प्राणापान (स्वधाभिः) = आत्मधारण शक्तियों के हेतु से (सोम्यं मधु) = सोम सम्बन्धी मधु का (पिबतः) = पान करते हैं। शरीर में सोम को सुरक्षित करके ये प्राणापान ही हमें आत्मधारण शक्ति प्राप्त कराते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्राणसाधना के होने पर जीवन में 'यज्ञ, प्रभु-स्तवन, सोमरक्षण व आत्मधारण शक्ति' का प्रादुर्भाव होता है।

शिव शंकर शर्मा

पुनरपि राजकर्त्तव्यमाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! ययोः=अश्विनोः=पुण्यकृतयो राज्ञोः। अधि=उपरि। यज्ञाः=सर्वाणि शुभकर्माणि। प्रभवन्ति=आश्रिताः सन्ति। ययोः। सूरयः=विद्वांसो जनाः। असूरे=प्राक् सूर्य्योदयाद् उत्थिताः। सन्ति=भवन्ति। यद्वा। ययोः। असूरे=असूर्य्येऽपि। देशे=उत्तरीयध्रुवनिकट- प्रदेशेऽपि। सूरयो=विद्वांसो जनाः प्रजात्वेन सन्ति। यौ ता=तौ। अध्वरस्य=हिंसाप्रत्यवायरहितस्य। यज्ञस्य= शुभकर्मणः। प्रचेतसा=प्रकृष्टज्ञातारौ स्तः। तौ। स्वधाभिः= स्वधायिनीभिः=स्वरक्षिकाभिः प्रजाभिः सह। सोम्यम्= सोममिलितं मधु पिबतः ॥४॥

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (ययोः) ययोरश्विनोः (यज्ञाः, प्र, अधि) यज्ञाः अधिकाः प्रवर्तन्ते (असूरे) विद्यारहितप्रदेशे (सूरयः, सन्ति) विद्वांसो निवसन्ति (अध्वरस्य, यज्ञस्य, प्रचेतसा) हिंसारहितयज्ञानां ज्ञातारौ (ता, स्वधाभिः) तौ स्तुतिभिरायातम् (या) यौ (सोम्यम्, मधु, पिबतः) सोमसम्बन्धिरसं पिबतः ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The Ashvins’ yajnas are specially performed even in the lands of the agnostics where they shine boldly and brilliantly. They are specialists of the yajnic programmes of creation and production without violence and they come in response to invocations and yajnic offerings and drink the sweets of soma.