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इन्द्रा॑विष्णू दृंहि॒ताः शम्ब॑रस्य॒ नव॒ पुरो॑ नव॒तिं च॑ श्नथिष्टम् । श॒तं व॒र्चिन॑: स॒हस्रं॑ च सा॒कं ह॒थो अ॑प्र॒त्यसु॑रस्य वी॒रान् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

indrāviṣṇū dṛṁhitāḥ śambarasya nava puro navatiṁ ca śnathiṣṭam | śataṁ varcinaḥ sahasraṁ ca sākaṁ hatho apraty asurasya vīrān ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रा॑विष्णू॒ इति॑ । दृं॒हि॒ताः । शम्ब॑रस्य । नव॑ । पुरः॑ । न॒व॒तिम् । च॒ । श्न॒थि॒ष्ट॒म् । श॒तम् । व॒र्चिनः॑ । स॒हस्र॑म् । च॒ । सा॒कम् । ह॒थः । अ॒प्र॒ति । असु॑रस्य । वी॒रान् ॥ ७.९९.५

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:99» मन्त्र:5 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:24» मन्त्र:5 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:5


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राविष्णू) हे न्याय और वज्ररूप शक्तिवाले परमात्मन् ! आप (दृंहिताः) दृढ़ से दृढ़ (शम्बरस्य) मेघ के समान फैले हुए शत्रु के (नवनवतिं) निन्यानवे (च) और उस (वर्चिनः) मायावी पुरुष के (शतं) सैकड़ों (च) और (सहस्रं) हजारों (पुरीः) दुर्गों को (श्नथिष्टं) नाश करें तथा (साकं) शीघ्र ही (अप्रत्यसुरस्य) उसके उभरने से प्रथम ही उसके (वीरान्) सैनिकों को (हथः) हनन करो ॥५॥
भावार्थभाषाः - मायावी शत्रु को दमन करने के लिये न्यायशील पुरुषों को परमात्मा उपदेश करते हैं कि तुम लोग अन्यायकारी शत्रुओं के सैकड़ों हजारों दुर्गों से मत डरो, क्योंकि (माया) अन्याय से जीतने की इच्छा करनेवाला असुर स्वयं अपने पाप से आप मारा जाता है और उसके लिये आकाश से वज्रपात होता है, जैसा कि अन्यत्र भी कहा है कि “प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र” ॥ मं. ७।१०४ मं, १९॥ परमात्मा ! तुम अन्यायकारी मायावी के लिये आकाश से वज्रपात करो। इस प्रकार न्याय की रक्षा के लिये वीर पुरुषों के प्रति यहाँ परमात्मा का उपदेश है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अजेय शत्रुसेना पर विजय

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (इन्द्राविष्णू) = ऐश्वर्यवन्! हे व्यापक शक्तिशालिन् ! आप दोनों (शम्बरस्य) = शान्तिसुख-नाशक शत्रु के (नव नवतिं च पुरः) = ९९ नगरियों, प्रकारों को (श्नथिष्टम्) = नाश करो। (असुरस्य) = बलवान् शत्रु के (अप्रति) = बेजोड़, (शतं सहस्त्रं च बर्चिन: वीरान्) = सौ हजार तेजस्वी वीरों को (साक हथः) = एक साथ दण्डित करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजा और सेनापति राष्ट्र में सुख और शान्ति स्थापना करने के लिए शत्रु के ९९ [निन्यानवे] प्रकार की नगरों को नष्ट करने की विद्या को जानकर शत्रु की अजेय सौ हजार सेना को भी परास्त करें।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राविष्णू) हे न्यायशक्तिमन् ! व्यापकशक्तिमँश्च परमात्मन् ! भवान् (दृंहिताः) सर्वत्र वृद्धिमाप्नुवानः (शम्बरस्य) मेघवत्प्रसृतस्य शत्रोः (नव, नवतिम्) नवनवतिं तथा (वर्चिनः) मायाविनस्तस्य (शतम्) शतसङ्ख्याकानि (च) च पुनः (सहस्रम्) सहस्रसङ्ख्याकानि (पुरः) दुर्गाणि (श्नथिष्टम्) ध्वंसयतु, तथा (साकम्) शत्रूनपि युगपदेव नाशयत (अप्रत्यसुरस्य) तस्य च अप्रतिद्वन्द्विनः (वीरान्) सैनिकान् (हथः) हिनस्तु ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra-Vishnu, lord of unrivalled might and universal presence, you break through the nine and ninety fortified strongholds of the dark and expansive citadels of hoarded treasure and destroy a hundred, even thousand, of the brave warriors together even before the unique evil power is up for defence and offence.