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उ॒त स्या न॒: सर॑स्वती जुषा॒णोप॑ श्रवत्सु॒भगा॑ य॒ज्णे अ॒स्मिन् । मि॒तज्ञु॑भिर्नम॒स्यै॑रिया॒ना रा॒या यु॒जा चि॒दुत्त॑रा॒ सखि॑भ्यः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta syā naḥ sarasvatī juṣāṇopa śravat subhagā yajṇe asmin | mitajñubhir namasyair iyānā rāyā yujā cid uttarā sakhibhyaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त । स्या । नः॒ । सर॑स्वती । जु॒षा॒णा । उप॑ । श्र॒व॒त् । सु॒ऽभगा॑ । य॒ज्ञे । अ॒स्मिन् । मि॒तज्ञु॑ऽभिः । न॒म॒स्यैः॑ । इ॒या॒ना । रा॒या । यु॒जा । चि॒त् । उत्ऽत॑रा । सखि॑ऽभ्यः ॥ ७.९५.४

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:95» मन्त्र:4 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:19» मन्त्र:4 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:4


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (स्या, सरस्वती) वह सरस्वती (नः) हमारे लिए (जुषाणा) सेवन की हुई (अस्मिन्) इस ब्रह्मविद्यारूपी (यज्ञे) यज्ञ में (श्रवत्) आनन्द की वृष्टि करती है (उत) और (मितज्ञुभिः) संयमी पुरुषों द्वारा (इयाना) प्राप्त हुई (सुभगा, राया) धन से मित्रों को वृद्धियुक्त करती है, (चिदुत्तरा) उत्तरोत्तर सौन्दर्य्य को देनेवाली (नमस्यैः) नमस्कार से और (सखिभ्यः) मित्रों को सदैव वृद्धियुक्त करती है ॥४॥
भावार्थभाषाः - सरस्वती विद्या यदि संयमी पुरुषों द्वारा अर्थात् सदाचारी पुरुषों द्वारा उपदेश की जाय, तो पुरुष को ऐश्वर्य्यशाली बनाती है, सदा के लिए अभ्युदयसम्पन्न करती है ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्त्री के कर्त्तव्य - ३

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (उत) = और (स्या) = वह सरस्वती ज्ञानवाली विदुषी स्त्री, (जुषाणा) = स्नेह करती हुई (अस्मिन् यज्ञे) = इस यज्ञ में (सु-भगा) = सौभाग्यवती होकर (नः उप श्रवत्) = हमारी बात सुने। वह (नमस्यैः) = नमस्कार योग्य (मित-ज्ञुभिः) = परिमित संकुचित जानुओंवाले, ज्ञातव्य पदार्थों के ज्ञाता पुरुषों के साथ इयाना प्राप्त होती हुई (राया) = ऐश्वर्य (चित्) = और (युजा) = सहयोगी पति से तू (सखिभ्यः) = स्व सखियों से उत्तरा अधिक उत्कृष्ट हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-विदुषी स्त्री ज्ञान व स्नेह से पति एवं परिजनों की बातों को सुना करे। यज्ञ कार्यों को नियमित करे तथा अपनी सखियों में भी उच्च स्थान प्राप्त करे।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (स्या, उत, सरस्वती) सा सरस्वती (नः) अस्मभ्यं (जुषाणा) हितं चरन्ती (अस्मिन्) एतस्मिन् (यज्ञे) ऋते (श्रवत्, सुभगा) शोभमाना विराजते (नमस्यैः) स्तोतृभिः (मितज्ञुभिः) संयमीभिः (इयाना) प्राप्यमाणा (राया) धनेन (सखिभ्यः) मित्राणि (चित्, उत्तरा) उत्तरोत्तरं हि (युजा) संयोज्य वर्द्धयति ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - And that perennial living stream, Sarasvati, loving and gracious, overflowing with wealth, honour and excellence, may come, we pray, and listen to us in this yajna of life. When approached by the yajnics of discipline with reverence and homage, she showers her favours full of wealth higher and ever more on her devoted friends.