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प्र याभि॒र्यासि॑ दा॒श्वांस॒मच्छा॑ नि॒युद्भि॑र्वायवि॒ष्टये॑ दुरो॒णे । नि नो॑ र॒यिं सु॒भोज॑सं युवस्व॒ नि वी॒रं गव्य॒मश्व्यं॑ च॒ राध॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra yābhir yāsi dāśvāṁsam acchā niyudbhir vāyav iṣṭaye duroṇe | ni no rayiṁ subhojasaṁ yuvasva ni vīraṁ gavyam aśvyaṁ ca rādhaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । याभिः॑ । यासि॑ । दा॒श्वांस॑म् । अच्छ॑ । नि॒युत्ऽभिः॑ । वा॒यो॒ इति॑ । इ॒ष्टये॑ । दु॒रो॒णे । नि । नः॒ । र॒यिम् । सु॒ऽभोज॑सम् । यु॒व॒स्व॒ । नि । वी॒रम् । गव्य॑म् । अश्व्य॑म् । च॒ । राधः॑ ॥ ७.९२.३

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:92» मन्त्र:3 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:3 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:3


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वायो) हे ज्ञानयोगी विद्वन् ! (इष्टये) यज्ञ के लिए (दुरोणे) यज्ञमण्डपों में जाकर (नियुद्भिः) याज्ञिक लोगों द्वारा आह्वान किये हुए आप (यासि) जाकर प्राप्त होओ और वहाँ जाकर (वीरं) वीरतायुक्त पुरुष (गव्यं) गौऐं (अश्व्यं) घोड़े (च) और (राधः) धन को (युवस्व) दें और (सुभोजसम्) सुन्दर-सुन्दर भोजन (रयिं) धनादि पदार्थ दें ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि यजमानों से आह्वान किये हुए विद्वान् लोग यज्ञमण्डपों में जाकर जनता को गौऐं, घोड़े और धनादि ऐश्वर्यों के उत्पन्न करने का उपदेश करें ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

ऐश्वर्यशाली राष्ट्र

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (वायो) = बलवन् ! (याभिः नियुद्भिः) = जिन अश्वादि सेनाओं सहित (दुरोणे) = गृहवत् राष्ट्र में विद्यमान (दाश्वांसम्) = कर आदि के दाता प्रजाजन को (अच्छ प्र यासि) = भली प्रकार प्राप्त होता है उन द्वारा ही तू (न:) = हमें (सुभोजसं रयिम्) = उत्तम भोग्य पदार्थों और रक्षा-साधनों से सम्पन्न ऐश्वर्य को (नि युवस्व) = दे और (वीरं) = वीरजन, (गव्यं राधः) = गौ आदि और (अश्व्यं च राधः) = अश्वों से बनी सम्पदा भी (नि युवस्व) = दे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राजा को योग्य है कि वह अपने राष्ट्र को समृद्ध एवं सुदृढ़ बनाने के लिए अश्वादि से सुसज्जित वीर सेना को बढ़ावे तथा व्यापार आदि कार्यों की वृद्धि की योजना बनावे, जिनसे कर के रूप में धन प्राप्त करके प्रजाजनों को ऐश्वर्यशाली तथा अन्य योजनाओं को सफल बनाया जा सके।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (वायो) हे ज्ञानयोगिन् ! (इष्टये) यज्ञाय (दुरोणे) यज्ञशालायां (नियुद्भिः) याज्ञिकैराहूतः (यासि) तत्र गच्छ गत्वा च (वीरम्) वीरपुरुषं (गव्यम्) गोसङ्घम् (अश्व्यम्) अश्वसङ्घं च (च) च पुनः (राधः) अन्नादिपदार्थं (युवस्व) देहि (सुभोजसम्) सुष्ठुभोज्यपदार्थं (रयिम्) धनानि च देहि ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vayu, lord of knowledge and motivation, come by superfast transport with supportive knowledge and expertise with which you proceed to the house of the liberal host of yajna for the fulfilment of his desired aim. Bless us with delicious food and wealth for comfortable life, brave generation of youth, plenty of lands and cows, horses and transport, and the success mantra to attain what is possible further on.