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प्र सोता॑ जी॒रो अ॑ध्व॒रेष्व॑स्था॒त्सोम॒मिन्द्रा॑य वा॒यवे॒ पिब॑ध्यै । प्र यद्वां॒ मध्वो॑ अग्रि॒यं भर॑न्त्यध्व॒र्यवो॑ देव॒यन्त॒: शची॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra sotā jīro adhvareṣv asthāt somam indrāya vāyave pibadhyai | pra yad vām madhvo agriyam bharanty adhvaryavo devayantaḥ śacībhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । सोता॑ । जी॒रः । अ॒ध्व॒रेषु॑ । अ॒स्था॒त् । सोम॑म् । इन्द्रा॑य । वा॒यवे॑ । पिब॑ध्यै । प्र । यत् । वा॒म् । मध्वः॑ । अ॒ग्रि॒यम् । भर॑न्ति । अ॒ध्व॒र्यवः॑ । दे॒व॒ऽयन्तः॑ । शची॑भिः ॥ ७.९२.२

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:92» मन्त्र:2 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:14» मन्त्र:2 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:2


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अध्वर्यवः) यज्ञों के धारण करनेवाले अध्वर्यु लोग (अध्वरेषु) यज्ञों में (सोमं) सोम रस को (अस्थात्) स्थिर करते हैं, क्योंकि (इन्द्राय) कर्मयोगी, (वायवे) ज्ञानयोगी के (पिबध्यै) पिलाने के लिए और अध्वर्यु लोग (शचीभिः) कर्मों के द्वारा (देवयन्तः) प्रार्थना करते हुए (अग्रियम्) सारभूत इस सोमरस को (भरन्ति) धारण करते हैं, (यत्) जो (मध्वं) मीठा है और (वाम्) तुम विद्वान् लोगों के निमित्त बनाया गया है ॥२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा उपदेश करते हैं कि हे यजमान लोगों ! तुम सुन्दर-सुन्दर पदार्थों के रस निकाल कर विद्वानों को तृप्त करो, ताकि वे प्रसन्न होकर तुमको उपदेश दें ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अहिंसक राष्ट्रपालक

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - (यत्) = जिस (मध्वः) = शत्रुपीड़क बल और मधुर ऐश्वर्य के (अग्रियं) = प्रमुख पद तथा श्रेष्ठ भाग को (देवयन्तः) = शुभ गुणों और उत्तम फलों की आकांक्षावाले (अध्वर्यवः) = प्रजा की हिंसा से रहित राष्ट्र-पालक जन (वां प्र भरन्ति) = आप दोनों के लिये प्राप्त कराते हैं, उस (सोमम्) = ऐश्वर्य या बल वीर्य को (इन्द्राय वायवे) = सूर्य वायुवत् तेजस्वी और बलवान् पुरुष के (पिबध्यै) = उपभोग के लिये (अध्वरेषु) = यज्ञादि उपकारक कार्यों में (वीरः सोता) = विद्वान् वीर शासक, (प्र अस्थात्) = प्राप्त करे।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र में विभिन्न शासकीय पदों पर श्रेष्ठ लोगों को नियुक्त करके राजा प्रजा का उत्तमता से पालन करें। वे नियुक्त प्रशासक जन प्रजा की हिंसा न करें। यज्ञादि कार्यों में सहयोगी होकर विद्वानों का सम्मान करें।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अध्वर्यवः) यज्ञं बिभ्राणाः वैदिकाः (अध्वरेषु) यज्ञेषु (सोमम्) सोमरसं (अस्थात्) स्थिरीकुर्वन्ति, यतः (इन्द्राय) कर्मयोगिनः (वायवे) ज्ञानयोगिनः (पिबध्यै) पानार्थम्, अध्वर्यवश्च (शचीभिः) कर्मभिः (देवयन्तः) प्रार्थनां कुर्वन्तः (अग्रियम्) सारमिमं सोमरसं (भरन्ति) धारयन्ति (यत्) यः (मध्वम्) मधुरः तथा (वाम्) भवदर्थं मया निर्मितः ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - 2. The active press and the soma maker stand ready in holy yajnas of love and non-violence to offer hospitality to Indra and Vayu, masters of knowledge and enlightenment and action and advancement. O Indra and Vayu, holy yajakas seeking the favour of divinity with their best and holiest actions prepare the best and sweetest soma and keep it for you as homage with reverence.