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या वां॑ श॒तं नि॒युतो॒ याः स॒हस्र॒मिन्द्र॑वायू वि॒श्ववा॑रा॒: सच॑न्ते । आभि॑र्यातं सुवि॒दत्रा॑भिर॒र्वाक्पा॒तं न॑रा॒ प्रति॑भृतस्य॒ मध्व॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yā vāṁ śataṁ niyuto yāḥ sahasram indravāyū viśvavārāḥ sacante | ābhir yātaṁ suvidatrābhir arvāk pātaṁ narā pratibhṛtasya madhvaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । वा॒म् । श॒तम् । नि॒ऽयुतः॑ । याः । स॒हस्र॑म् । इन्द्र॑वायू॒ इति॑ । वि॒श्वऽवा॑राः । सच॑न्ते । आभिः॑ । या॒त॒म् । सु॒ऽवि॒दत्रा॑भिः । अ॒र्वाक् । पा॒तम् । न॒रा॒ । प्रति॑ऽभृतस्य । मध्वः॑ ॥ ७.९१.६

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:91» मन्त्र:6 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:13» मन्त्र:6 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:6


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रवायू) हे ज्ञानयोगी और कर्मयोगी पुरुषो ! (वाम्) तुम लोगों को (याः) जो आप (विश्ववाराः) सबके वरणीय हो, ऐसे आपको (याः) जो लोग (शतम्) सैकड़ों वार (सहस्रं) सहस्रों वार (नियुतः) नियुक्त हुए (सचन्ते) सेवन करते हैं, वे संगति को प्राप्त होते हैं, इसलिये (नरा) वैदिक मार्ग के नेता लोगों ! (अर्वाक्) हमारे सम्मुख (आभिः) सुन्दर मार्गों से (यातं) आओ और (मध्वः, प्रतिभृतस्य) आपके निमित्त जो मीठा रस रक्खा गया है, इसे आकर (पातं) पिओ ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो लोग कर्मयोगी और ज्ञानयोगी पुरुषों की सैकड़ों और सहस्रों वार संगति करते हैं, वे लोग उद्योगी और ब्रह्मज्ञानी बन कर जन्म के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चारों फलों को प्राप्त होते हैं ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सुशिक्षित सेना

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ - हे (इन्द्रवायू) = विद्युत्, पवन के समान तेजस्वी, बलशाली पुरुषो! (याः) = जो (वां) = आप दोनों के (शतं) = सैकड़ों और (याः सहस्त्रं) = जो सहस्रों (नियुतः) = अश्वों के सैन्यगण (विश्ववारा:) = शत्रुओं के वारण में समर्थ होकर (सचन्ते) = संघ बनाकर रहते हैं (आभिः) = इन (सु-विदत्राभिः) = उत्तम ऐश्वर्य लाभ करानेवाली सुशिक्षित सेनाओं से आप दोनों (अर्वाक् यातं) = आगे बढ़ो। हे (नरा) = नायक पुरुषो! आप दोनों (प्रतिभृतस्य) = वेतन द्वारा परिपुष्ट (मध्वः) = सैन्य बल की (पातम्) = रक्षा करो।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- सेनानायक अपनी पैदल तथा अश्वारोही सेना को गणों तथा संघों में बाँटकर उत्तम प्रशिक्षण प्रदान कर सेना को सुशिक्षित करे। अपने सैनिकों को वेतन बढ़ाकर उत्साहित करता रहे।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रवायू) हे ज्ञानयोगिनः कर्मयोगिनश्च ! (वाम्) युष्मान् (याः) ये यूयं (विश्ववाराः) विश्वैर्वरणीयास्तान् (याः) ये नराः (शतम्) शतशः (सहस्रम्) सहस्रशश्च (नियुतः) नियुक्ताः (सचन्ते) सेवन्ते, ते सङ्गतिं प्राप्नुवन्ति (नरा) हे वैदिकनरः ! (अर्वाक्) अस्मदभिमुखम् (आभिः) एभिः (सुविदत्राभिः) शोभनमार्गैः (यातम्) आगच्छत तथा (मध्वः, प्रतिभृतस्य) भवदर्थे निहितं मधुरं रसं (पातम्) पिबत ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra and Vayu, leading lights of knowledge and action, heroes of universal faith and choice, hundreds are your supporters, thousands indeed, who join and support you. With these, come hither to us by propitious paths with blissful gifts and, O leaders and pioneers, accept the honey sweets of our homage of abundant soma.